गहलोत को घेरने भाजपा का नए चेहरे पर दांव...चर्चा में जोधपुर के अश्विन वैष्णव

राजस्थान में भाजपा नए चेहरे पर लगा सकती है दांव...चर्चा में अश्विन वैष्णव
फर्स्ट न्यूज:संजय सनम
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले सबकी नजर राजस्थान,मध्यप्रदेश,कर्नाटक,छत्तीसगढ़ के चुनाव पर है। दो जगह कांग्रेस की सरकार तो दो जगह भाजपा की सरकार है।
अब इन चुनावों में जो  रस्साकसी और सियासत चल रही है उससे यह लगता है कि भाजपा और कांग्रेस अपना पूरा जोर यहां लगा रही है क्योंकि इसका असर मतदाताओं पर 2024 में काफी हद तक रहेगा और सबसे बड़ी बात जनता के इस मन को इतना जल्दी बदलना भी कोई आसान नहीं है इसलिए दोनो पार्टियां अपना सर्वश्रेष्ठ यहां देना चाहती है।
जहां तक सवाल है राजस्थान का यहां एक मिथक वर्षो से चल रहा है एक बार कांग्रेस तो दूसरी बार भाजपा...इस हिसाब से इस बार भाजपा की बारी है पर कांग्रेस की भी इस मिथक को तोड़ने की पूरी तैयारी है।
अगर अभी तक के माहौल को पढ़ा जाए तो रणनीति और निर्णय के आधार पर कांग्रेस भाजपा से आगे है क्योंकि कांग्रेस हाईकमान ने पार्टी के  अंदर की कलह को या तो शांत कर दिया है या फिर उस बगावत के लिए भी खुद को तेयार कर लिया है।
कांग्रेस ने जादूगर के हाथ में एक बार फिर विधान सभा चुनाव 2023 की कमान दे दी है और भाजपा की कलह का अप्रत्यक्ष रूप से पूरा लाभ लेती हुई दिख रही है क्योंकि कांग्रेस यह जानती है कि गहलोत और वसुंधरा राजे की केमेस्ट्री का समीकरण पूरी तरह से उसके पक्ष में है जिससे सचिन भी अब बगावत करने की दूसरी कोशिश नहीं कर पाएंगे और भाजपा अगर वसुंधरा को साइड लाइन करती है तब वसुंधरा की खुली या ढकी बगावत कांग्रेस के पक्ष में ही लाभ का समीकरण लाएगी।
इस लिहाज से राजस्थान में कांग्रेस अपनी रणनीति से भाजपा से दो कदम आगे बढ़ चुकी है।
इधर अशोक गहलोत ने इन दिनों जो फैसले लिए है वे भी कही न कही कांग्रेस के पक्ष की हवा बन गए है।
कांग्रेस के सचिन अभी चुप ही रहते लग रहे है क्योंकि तकदीर की बात शायद उनको समझ में आ गई लगती है इसलिए कांग्रेस के अंदर के विरोध का टेंशन काफी हद तक निदान हो गया है पर भाजपा के लिए सबसे बड़ी टेंशन वसुंधरा राजे जी का बार बार शक्ति दिखाकर एक संकेत देना है क्योंकि वसुंधरा जी के मुकाबिले भाजपा में  दिखते चेहरों में कोई ऐसा प्रभावी नहीं पर कुछ ऐसी शिकायते है जिनकी वजह से भाजपा नेतृत्व किसी भी कीमत पर वसुंधरा जी के हाथ में  कमान देने को तैयार नहीं।
वसुंधरा की भीतरी या खुली बगावत से संभावित हानि को समझने के बाद भी भाजपा नेतृत्व वसुंधरा को चुनावी चेहरा नहीं बनाएगा यह अंदेशा साफ लग रहा है।
अब सवाल है क्या भाजपा के पास कोई ऐसा चेहरा है जिस पर पार्टी की राज्य इकाई के अंदर सहमति बन सके। 
जहां तक वसुंधरा विरोधी गुट का सवाल है उनकी प्राथमिकता वसुंधरा को रोकना है और उसके बाद अगर कोई चेहरा ऐसा है जो राज्य की राजनीति से    चुनौती देने वाला नही हो तब फिर वे खुशी खुशी समर्थन देंगे।
वसुंधरा जी से भी नए चेहरे के लिए समर्थन मांगा जाएगा और यहां  पर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वसुंधरा जब अपने विरोधी गुट के किसी नेता का नाम नहीं देखे तो सम्मानजनक स्थिति में खुद को रखते हुए नए चेहरे को समर्थन दे ही दे ।
आलेख में दिए शीर्षक में नाम को देख कर आप अब सारे समीकरण समझ गए होंगे।
यह नाम अपने आप में सटीक तोड़ है क्योंकि राजस्थान का चेहरा है,पहले प्रशासनिक अधिकारी थे अब भारत सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर के रूप में रेल मंत्रालय को सम्हाल रहे है।
इनके नाम से राजस्थान में भाजपा इकाई में किसी को भी विरोध नहीं होगा ।
जोधपुर से श्री गजेन्द्र शेखावत भी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की दौड़ में है और वसुंधरा से भी इनका छत्तीस का आंकड़ा बताया जाता है इसको देखते हुए यह भी
 संभावना बनती है कि वसुंधरा यहां पर अश्वनी को मजबूती प्रदान करे।
अगर वसुंधरा मान जाती है तब तो भाजपा राजस्थान के उस मिथक के आधार पर चुनावी वैतरणी को सफलता के साथ पार कर सकती है अन्यथा भीतरी घात नुकसान तो करेगी ही।
संभावना इस बात को बता रही है कि भाजपा नेतृत्व ने वसुंधरा के बिना राजस्थान फतेह का मन बना लिया है और अब इसमें अगर प्रदेश से सरकार खोने की भी नौबत आ जाए तब भी केंद्रीय  नेतृत्व इसके लिए तैयार प्रतीत होता है।
गहलोत ने इन दिनों नए जिले बनाकर मास्टर स्ट्रोक चला था वही भाजपा भी अंदरखाने गहलोत सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है।जयपुर में 19 मार्च को जाट महाकुंभ के बाद विद्याधर नगर स्टेडियम में ब्राह्मणों ने एक जुटता दिखाते हुए महापंचायत का आयोजन किया जिसमें देश भर से ब्राह्मण समाज के लोगो के अलावा कई साधु संत पहुंचे।
यहां रेल मंत्री अश्विन वैष्णव का भाषण काफी चर्चित रहा। यहां उनका अंदाज पी एम मोदी की तरह  राजनीतिक दक्षता को उजागर करने में सफल रहा।
वैष्णव सूबे के जोधपुर से आते है ये पूर्व आईएएस रहे है और कई अहम पदों की जिम्मेदारी सम्हाल चुके है।
ब्राह्मण पंचायत में वैष्णव के भाषण के बाद राजनीतिक गलियारों में इस नए नाम की चर्चा तेज हो गई।यहां वैष्णव मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे।

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