राजस्थान विधान सभा चुनाव 2023
अभी दोनो पार्टियां गुटबंदी के तवे पर सेक रही रोटियां..
भाजपा ने अपनो के तोड़े सपने...
वन फैमिली वन टिकट....भाजपा का अपने ही घर में परिवारवाद पर प्रहार.. कइयों की हो गई नींद हराम
परिवारवाद टिकट बंटवारे के समय पार्टी के लिए अतिरिक्त परेशानी पैदा कर रहा था और कांग्रेस के परिवारवाद पर आरोप की धार को अपने घर की कमजोरी की वजह से हल्का कर रहा था...अब पार्टी का यह नीतिगत निर्णय कितने नेता शांति से मान लेंगे और कितने क्रांति के मूड में आ जाएंगे...यह समय बताएगा पर पार्टी ने सुधार की तरफ निर्णय अच्छा लिया है इसका पालन कितना हो पाता है इस पर सबकी नजर रहेंगी क्योंकि नेता अपनी कुर्सी के होते है पार्टी का नाम और निष्ठा तो सिर्फ बहाना होता है...कुर्सी जाती देखकर लोग तुरंत पार्टी बदल लेते है..।
.इस निर्णय से अकेले राजस्थान के कई नेताओं के परिवार का राजनीतिक जीवन खतरे में आएगा और कितने लोग अपने परिवार के सदस्यों को दूसरी पार्टी से खड़ा करके अपनी ही पार्टी को कुल्हाड़ी मारेंगे यह भविष्य बताएगा और कुछ तो खुले आम बगावत करते हुए पार्टी तक छोड़ सकते है इसलिए ये दोनो निर्णय सुधारवादी तो है पर पार्टी के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण भी है।
भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले 2023 के आखिर में राजस्थान,मध्यप्रदेश,कर्नाटक छत्तीसगढ़ के सेमीफाइनल को पार करने के लिए कुछ ऐसी काट फैसले के तौर पर ला रही है जिससे पार्टी में परिवारवाद चलाने वाले नेताओं पर भी गाज गिरेगी और टिकट बटवारे के वक्त पार्टी हाईकमान के लिए राह भी आसान हो जाएगी...पार्टी के ये दो फैसले सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
...आइए इन दोनो निर्णयों का पार्टी पर पड़ने वाले प्रभाव का राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 के संदर्भ से विवेचना करते है।
भाजपा ने पार्टी में परिवारवाद रोकने के लिए वन फैमिली-वन टिकट का फॉर्मूला दिया है.. अब यदि यह फार्मूला अक्षरश: लागू होता है तो राजस्थान के करीब 2 दर्जन से अधिक राजनीतिक परिवारों को झटका लगेगा तथा इसकी सीमा में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी आ सकती हैं।
वहीं पार्टी नेतृत्व के दूसरे फैसले 70 प्लस के अर्थात उम्र की इस सीमा में चुनाव नही लड़ने के निर्देश के इस फॉर्मूले के बाद कई वरिष्ठ बीजेपी नेताओं की अगले चुनावों में छुट्टी हो जाएगी।
राजस्थान विधानसभा 2023 चुनाव तक कुछ तो तय उम्र की दहलीज पार कर चुके होंगे तो कईयों को परिवार को आगे बढ़ाने के लिए खुद की टिकट की कुर्बानी देनी पड़ेगी।
भाजपा पार्टी नेतृत्व द्वारा 70 प्लस को टिकट न देने पर विचार...
भाजपा पार्टी का यह निर्णय कई बड़े नेताओं को अप्रत्यक्ष रिटायरमेंट देने सा काम कर रहा है।अर्थात उम्र की सीमा रेखा के नियम की वजह से वे चुनाव नही लड़ पाएंगे।
पार्टी के इन दो बड़े फैसले के आधार पर राजस्थान में भाजपा के नेताओं पर भी अगर विचार करें तो कई कद्दावर सियासी परिवारों के समीकरण बदल जाएंगे।
यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके बेटे सांसद दुष्यंत सिंह भी पार्टी की नई नीति में फंस सकते हैं।
राजस्थान में 2023 में विधानसभा और देश में 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं।
इस नीति से पार्टी बड़े नेताओं के संभावित असंतोष पर पहले से ही बाड़ लगाने का काम कर रही है।
राजस्थान में भी कई बड़े नेताओं की महत्वकांक्षा पर प्रहार हुआ है जो अपने साथ अपने परिवार के लोगों को टिकट दिलाने में लगे रहते है।
राजस्थान विधान सभा चुनाव के परिपेक्ष्य में अगर बात करे तो दोनो मुख्य पार्टियां अपने आंतरिक असंतोष और घर में फुट की शिकार है।
भाजपा के दो पार्टीगत निर्णय टिकट बंटवारे में पार्टी की राह कितनी आसान करेंगे या उस वक्त बगावती तेवरों का सामना पार्टी को करना पड़ेगा यह समय बताएगा।
पर एक समीकरण साफ है कि मैडम वसुंधरा अपने शक्ति प्रदर्शन के साथ एक संदेश पार्टी नेतृत्व को लगातार दे रही है।
कुछ ऐसी ही स्थिति का शिकार कांग्रेस है जहां गहलोत के सामने सचिन पायलट तन कर खड़े है।
अगर कांग्रेस ने आखिरी वक्त पर सचिन के नाम मुहर लगा दी तो इसका प्रभावी लाभ भाजपा पार्टी नेतृत्व को मिलेगा क्योंकि तब वसुंधरा जी की आंतरिक चुनौती की धार लगभग भोंटी हो जायेगी लेकिन अगर कांग्रेस की कमान गहलोत जी के ही पास रही तब मैडम की चुनौती की धार दुगुनी मानी जा सकती है और तब भाजपा नेतृत्व के लिए निर्णय कड़ा लेना मुश्किल हो सकता है।
इस चुनाव में आम आदमी पार्टी भी अपना भाग्य आजमा रही है और पार्टी ने राजस्थान के इस चुनाव को काफी गंभीरता से लिया है। राजस्थान के कई बड़े शहरों में पार्टी ने संवाद कार्यक्रम रखे है।सबसे बड़ी बात यह है कि केजरीवाल ने गहलोत और राजे के बीच शानदार केमेस्ट्री को चुनावी मुद्दा बना दिया है और उनका सीधा आरोप ये दोनों मिलकर राजस्थान की जनता के साथ खेल रहे है।
केजरीवाल ने इन दोनों के नाम से दोनो प्रमुख पार्टी को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
भाजपा और कांग्रेस के असंतुष्ठ उम्मीदवारों के लिए आम आदमी एक विकल्प का प्लेटफार्म बन सकता है पर आम आदमी पार्टी अभी भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों से घिरी हुई है इसलिए फिलहाल बड़ा प्रभाव नहीं दिखता।
ओवैसी जी की पार्टी भी राजस्थान में करीब 40 सीटो पर चुनाव लडेगी। और इनकी उपस्थिति भाजपा के लिए सुखद होती है क्योंकि ओवैसी मुस्लिम वोट काटते है और वो नुकसान मुख्य रूप से कांग्रेस और अन्य पार्टी का ही होता है।
यहां जातिगत वोट से न सिर्फ समीकरण बिगाड़ने बल्कि कुछ सीट भी जीतने वाले श्री हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी की धमक भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी। श्री बेनीवाल का मुख्य रूप से जाट वोट पर अधिक प्रभाव है और राजस्थान की जाट बहुल सीटों पर ये दोनों मुख्य पार्टियों का समीकरण बिगाड़ सकते है।
इन सब पार्टियों के आने से भाजपा या कांग्रेस में से किसके वोट अधिक कटेंगे यह निर्णायक तथ्य होगा!
कुल मिलाकर 2023 के ये विधानसभा चुनाव अत्यंत रोमांचक होने है क्योंकि दोनो मुख्य पार्टी अपने घर की दांव पेच में उलझी हुई है।
मुख्य सवाल क्या मैडम वसुंधरा के नाम से यह चुनाव लडा जाता है या मोदी जी का ही चेहरा और नाम चलेगा।
दूसरा सवाल क्या जादूगर गहलोत कांग्रेस नेतृत्व को फिर जादू की झपकी देकर अपनी पावर को बचा पाते है या सचिन पायलट बाजी मार ले जाते है।
इस चुनाव का दिलचस्प पहलू यह है कि दोनो पार्टियों अपने घर में वर्चस्व की लड़ाई इस कदर लड़ रही है जैसे विपक्ष से लड़ी जाती हो...इनकी ऊर्जा और समय अपने अपने गुट की ताकत दिखाने में खर्च हो रहा है...अपनी पार्टी की सरकार बनाने की इनकी प्राथमिकता नहीं है बल्की पार्टी में चुनावी कमान अपने हाथ में लेने की अधिक है।
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