सम्मेद शिखर जी विवाद...जैन समाज से सवाल...
संजय सनम(फर्स्ट न्यूज)
कहा जाता है की जिस तरह से सनातन संस्कृति के लिए काशी का महत्व है ठीक उसी तरह से जैन समाज के लिए अपनी आस्था के शिखर पर श्री सम्मेद शिखर का स्थान है...
1 इस आस्था पर 2019 में झारखंड सरकार के फैसले पर केंद्र की मुहर लग गई थी तब ये 3 वर्ष की अवधि में हम जागे क्यों नहीं...! हमने तब अपनी आपत्ति को सही रूप से सरकार के सामने क्यों नहीं रखा!
क्या हम उस वक्त का इंतजार कर रहे थे जब यह आदेश हकीकत के पटल पर उतरता दिखे..और लोग पर्यटन स्थल के रूप में आते दिखे तब ही हम अपनी जुबान खोलेंगे ..!
हमारे वो विद्वान संत आचार्य जो सम्मेद शिखर में विराज भी रहे थे क्या उनको इस आदेश की भनक नहीं लगी थी....! उन्होंने अपने श्रावकों को समुचित कारवाई का आदेश क्यों नहीं दिया...!
माफी चाहता हूं...समय पर कारवाई अगर कर दी जाती तो हमारे दो संतों का बलिदान शायद नहीं होता...
क्या हमारे संत आचार्यों की यह जिम्मेदारी नहीं थी कि आदिवासी समाज से आध्यात्मिक जुड़ाव करते
और जैन समाज का नेतृत्व करने वाले अगर इस समाज के लिए उचित सेवा के आयाम खड़े कर देते तो क्या यह समाज हमारे विरोध में खड़ा होता हमको जिनका समर्थन चाहिए वे हमारे विरोध में खड़े हो गए ....हमने इन आदिवासी समाज के लिए इतने वर्षो में सेवा प्रकल्प कितने किए है! उनके लिए स्कूल,अस्पताल, और उनकी संपन्नता के प्रकल्प क्यों नहीं दिए!
हमने यह क्यों नहीं सोचा कि पर्वत क्षेत्र के चारों तरफ गांवों में रहने वाले आदिवासी समाज का दिल अगर हम जीत लेते है तो कभी भी राज्य सरकार और केंद्र सरकार के इस तरह के फरमान जारी करने की हिम्मत कभी भी नही हो सकती!
वहां से कुछ सूत्रों का कहना है कि जैन समाज ने अपने फार्म हाउस, अपनी धर्मशाला,अतिथि भवनों के अलावा यहां किया क्या है!
3 क्या यह सच नहीं कि हमारे कुछ संत आचार्य अपने नाम की ब्रांडिंग में अपने अपने भक्तों की जोड़ लगा रहे है....संत आचार्यों में अपने विस्तार की भूख कही न कही प्रतिस्पर्धा का रूप बनकर अपनी अपनी लॉबी बना रहा है....एक छोटे से समाज में आध्यात्मिक पथिकों में भी बड़ी गुटबाजी के संकेत मिल रहे है...और श्रावक भी इन गुटबाजी में बंट रहे है और दूसरी तरफ संप्रदाय की दीवार भी एकता में बाधक होती है..यह एक गंभीर मुद्दा है ...जो जैन समाज की एकता में बाधक है इस पर दोनो पक्षों की जिम्मेदारी सवालों के कठघरे में आती है...
4..करोड़ों का अनुदान आता है...हम भव्य मंदिर और धर्मशाला तो बना देते है पर जहां तीर्थंकर भगवानों की निर्वाण भूमि है उस क्षेत्र के विकास के लिए हमारी सोच क्यों नहीं होती!
बताया जाता है कि 20 तीर्थंकर भगवानों में से सिर्फ दो तीर्थंकर भगवान के उस दर्शनीय स्थल पर ट्रस्ट के द्वारा गार्ड की व्यवस्था की गई है...शेष 18 तीर्थंकर भगवान के स्थलो पर न तो गार्ड है ...और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार न ही हाथ धोने की व्यवस्था और न ही चप्पल जूता रखने का स्टैंड....दर्शनार्थियों के लिए यह व्यवस्था क्यों नहीं! अगर यह तथ्य सही है तो फिर आस्था पर सबसे बड़ा सवाल बनता है...
सवाल सबसे बड़ा यह है कि 18 तीर्थंकर भगवान के निर्वाण स्थल को हमने अनदेखा क्यों किया!
करोड़ों का अनुदान....और तीर्थंकर भगवान के वे श्रद्धा के स्थल अपने ही हाल में...फिर कैसी श्रद्धा!
क्या आस्था इसे ही कहते है!
5 तीर्थ की पवित्रता की रक्षा के लिए हम कितनी जिम्मेदारी निभाते है.!..याद आ रही है वो खबरे...जिनमे हमारे अपनो ही पवित्रता की सीमा रेखा का अतिक्रमण कर जाते है!
जैन समाज के आम लोग यह निर्णय करे कि क्या ये सवाल आपके जेहन में भी आते है...अगर हां तो अब उन संत आचार्यों से सीधे पूछिए सवाल और उन पदाधिकारियों से भी मांगिए जवाब....आपकी चुप्पी कुछ लोगों को तमाशा बनाने की छूट दे रही है।
क्षमा याचना सहित
संजय सनम
7278027381
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