जैन सभा,संस्थाओं के लिए विशेष....
जैन आचार संहिता का परिचय करवाने वाली पुस्तकों के प्रकाशन का सदप्रयास करना चाहिये ।
वर्तमान में लगभग 16 हजार जैन साधु-साध्वी भगवन्त सम्पूर्ण भारतवर्ष में विचरण करते हैं| करीब-करीब सभी भगवंत पैदल विचरण करते है एवं जैन दर्शन की प्रभावना करते हैं|
निसंदेह इनके विचरण एवं उपदेशों से भारतवर्ष के प्रत्येक धर्म एवं दर्शन के व्यक्तियों के मन में जैन धर्म के प्रति आस्था का भाव स्पष्ट रूप से प्रकट होता है|
जैन साधु-साध्वी भगवन्त कश्मीर से कन्याकुमारी (उत्तर से दक्षिण), पाकिस्तान सीमा से बांग्लादेश सीमा तक (पश्चिम से पूर्व) विभिन्न भाषाई प्रान्तों में विचरण करते है|
मेरी जानकारी के अनुसार भारत के अनेक धर्मों के व्यक्तियों के मन में जैन धर्म के प्रति आस्था एवं आदर का भाव तो है परन्तु जैन दर्शन को मानने वालों को छोड़कर अन्य किसी धर्म, दर्शन एवं सम्प्रदाय वाले व्यक्तियों को हमारे साधु भगवन्तों की आचारसहिंता की जानकारी का नितांत अभाव है|
क्या हमारा अर्थात जैन संघों का यह कर्तव्य नहीं हो जाता कि देश के उन प्रान्तों में सर्वसमाज के व्यक्तियों को उनकी स्थानीय एवं सहज-सरल भाषा-शैली में एक छोटी सी पुस्तक छपवाकर वितरण करने का महत्वपूर्ण कार्य करना चाहिए| जिससे सर्वधर्म, सर्वसमाज के व्यक्तियों को जैन दर्शन एवं जैन साधुओं कि आचार संहिता एवं दिनचर्या के बारे में ज्ञान हो सकें|
साथ ही इस कार्य से सर्वधर्म सर्वदर्शन के व्यक्तियों के मन में जैनधर्म, जैन दर्शन के बारे में जिज्ञासा उत्पन्न होगी| जैन धर्म के नियम, अनुशासन को जब वे नजदीक से जान पायेंगे तो निश्चित ही जैन धर्म के प्रति उनके आकर्षण एवं आस्था में भी वृद्धि होगी| साथ ही साथ हमारे जैन साधु-साध्वी वृन्दों को भी इन सुदूर क्षेत्रों में अपनी आचार संहिता के अनुपालन में किसी तरह की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा|
त्यागमयी जैन धर्म एवं जैन संस्कृति पर संत शिरोमणी चौथमल जी महाराज सा द्वारा लिखी कविता के कुछ अंश मुझे याद आ रहे हैं-
उन्नाला में गर्मी घणी पड़े,
पन पंखा नहीं चलावे
रे साधु जैन का|
श्याला में शी (सर्दी)
घणी पड़े फिर भी
तप नहीं तापे
रे साधु जैन का||
यह कविता बहुत बड़ी है जिसमें त्यागमयी जैन संस्कृति के बारे में महाराज सा ने विस्तृत रूप में बताया है| कविता के दुसरे अंश में स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ, इसके लिए क्षमा प्रार्थी|
अंत में मेरा सभी संघों से निवेदन है कि स्थानीय भाषा में जैन संस्कृति का परिचय करवाने वाली एवं साधु जीवन की आचार संहिता को बताने वाली छोटी-छोटी परन्तु बहुमूल्य पुस्तकें जो स्थानीय भाषा में हो सहज एवं सरल शैली में लिखी गई हो| ऐसी बहुमूल्य पुस्तकों का लेखन एवं प्रकाशन कर वितरण करने का सदप्रयास करें|
जय जिनेद्र
सुगालचन्द जैन
चेन्नई, तमिलनाडु
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