जैन साधु की पहिचान जानिए

जैन साधु कौन हैं!
जैन साधु की पहिचान क्या है!
जैन दर्शन संसार का सर्वश्रेष्ठ दर्शन है| जैन मुनिजन पंच महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अस्तेय) का पालन कर जीवदया का भाव रखते हुए कठोरतम जीवन बिताते है| इनके जीवन का उद्देश्य मानव कल्याण है अतः सम्पूर्ण जीवन पैदल विहार कर मानव कल्याण हेतु कार्य करते हैं|
पूजनीय चौथमल जी महाराज सा. द्वारा राजस्थानी भाषा में रचित कविता जैन धर्म के आधार स्तम्भ मुनिजनों की जीवन यात्रा को सुन्दर एवं भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है| राजस्थानी भाषा में रचित-
साधु जैन का... मुखड़ा रे ऊपर मुखपति बांधे रे ...||
पाँच महाव्रत पाले मुनिवर, टाले दोषण सारा रे|
सब जीवाँ ने साताकारी, सो गुरु म्हारा रे...||
काव्य का मैंने गद्य स्वरूप में भावानुवाद करने का प्रयास किया है| जिसमें महाराज सा. कहते है:-
जैन साधु संसार में व्याप्त सभी जीवों के प्रति संवेदनशील होते है वह जाने-अनजाने में भी किसी जीव को हानी नहीं पहुचाते इसलिए उन्होंने अपने जीवन को जीने के नियम बनाये है उन्ही नियमों का परिपालन करते हुए जैन साधुगण नित्य अपने मुख पर मुखपति (मुँहपत्ती) बाँध कर रखते हैं| जिससे वायु मण्डल में व्याप्त असंख्य अतिसूक्ष्म जीवों को उनसे किसी प्रकार की हानी नहीं हो| 
 जैन मुनिजन जैन धर्म के पाँचों महाव्रत (अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अस्तेय) का कठोरता से पालन करते हुए सभी प्रकार के दोषों से दूर रहते हैं| उनके मन में संसार के सभी जीवों के प्रति दया एवं प्रेम का भाव है। ऐसे हमारे पूजनीय गुरुवर है। 
सभी मुनिवर जिन धर्म के नियमों का पालन कठोरता से करते हैं। भयंकर सर्दी होने पर भी किसी प्रकार से अग्नि का सहारा नहीं लेते है| वहीं गर्मी के मौसम में भी पंखा आदि का प्रयोग नहीं करके सहज जीवन जीते है| जिससे वायु मण्डल में व्याप्त असंख्य सूक्ष्म जीव एवं मच्छर आदि का जीवन नष्ट नहीं हो| अर्थात जैन मुनिजन ऐसे है जो स्वयं कष्ट सहकर भी दुसरे जीवों को अभयदान देते हैं|
जैन मुनिजन तुलसी के पौधे कि परिक्रमा नहीं करते एवं न ही तुलसी के पत्तों को तोड़ते है अर्थात प्रकृति में जीवन है एवं प्रकृति असंख्य सूक्ष्म जीवों का निवास स्थान है अतः मुनिजन प्रकृति एवं जीवों के अनुरूप अपना जीवन जीते हैं|
गौधुली बेला वह समय होता है जब गायें संध्याकाल के समय ग्राम में वापस लौटती है एवं उनके पांवों से जो गौ-रज (गौ-धूलि) उड़ती है उस संध्याकालीन समय को गौधुली बेला कहा गया है|  
जैन मुनिजन गौधुली बेला से पूर्व अपना भोजन एवं जल ग्रहण करते है उसके पश्चात सम्पूर्ण रात्रि अन्न का एक भी कण एवं जल की एक भी बून्द ग्रहण नहीं करते| ताकि अनजाने में भी जीव हत्या के भागी नहीं बने| 
मुनिजन संसारिकता एवं सांसारिक वस्तुओं से दूर रहते है कीमती से भी कीमती धातु भी इनके लिए मूल्यहीन है| इसलिए यह सुई की नौक के बराबर किसी भी प्रकार की धातु अपने साथ नहीं रखते| अगर मुनिजन कोई वस्तु या सामग्री आवश्यकता होने पर किसी से लेते भी है तो संध्या से पूर्व लौटा देते है|
यह माना गया है कि पेड-पौधों में जीवन है एवं यह वनस्पति असंख्य जीवों का जीवन स्थल है, अतः जैन मुनिजन कभी भी हरी सब्जी, फल आदि ग्रहण नहीं करते है साथ ही हरी घास पर भी  विचरण नहीं करते हैं| ऐसे हमारे पूजनीय मुनिजन है ।
जैन मुनिजन संसारिकता से दूर रहकर एकाकी जीवन जीते है| मानव कल्याण इनके जीवन का ध्येय है| इनका जीवन सभी प्रकार की विषय वासनाओं से कोसों दूर है| यह कंचन एवं कामिनी के त्यागी है| अतः इन सबका इनके जीवन में कोई स्थान नहीं है|
जैन मुनिजन हर प्रकार के नशे (भांग, धतुरा, गांजा आदि) का सेवन कभी नहीं करते| ना ही जैन मुनिजन किसी प्रकार के वाद्य यंत्रों अर्थात सामान्य मानव की भांति गाने बजाने का शौक रखते है| रात्रि के समय का उपयोग यह आराधना, ध्यान के लिए करते है अथवा शयन करते हैं|
जैन मुनिजन संसार के परोपकार हेतु बिना किसी शिकायत, मान मनुहार के, हाथी-घोड़े-रेल-मोटर आदि के बिना, नंगे पाँव सम्पूर्ण देश का विहार करते है| अर्थात इनके जीवन का उद्देश्य संसार का परोपकार करना, मानव कल्याण के उपदेश देकर मानव को सद्मार्ग की और अग्रसर करना, जीवदया, परोपकार, प्रेम, त्याग, समर्पण के भाव मानव के मन में जाग्रत कर  सद्मार्ग पर बढ़ाना है|
जैनमुनि हमेशा मीठी वाणी बोलते हैं वह कभी भी कर्कश वाणी का प्रयोग नहीं करते जो मनुष्यों को खारी लगे अर्थात बुरी लगे|
जैन साधू, साध्वी,  त्याग की मूर्ति होते है जहाँ मानव ना-ना प्रकार के व्यंजनों एवं स्वाद की चाह रखता है वहीं जैनमुनि कभी भी किसी के घर पर आमंत्रण पर भोजन करने नहीं जाते| परंतु जो भी रुखा-सूखा भोजन उन्हें गोचरि  से प्राप्त होता है उसे ही वे ग्रहण करते हैं| ऐसे हमारे पूजनीय मुनिजन है|
होली के समय राजस्थान के नानणा ग्राम में दो मुनिजन विहार करते हुए पधारे एवं इसी नानणा ग्राम में पूजनीय चौथमल जी महाराज सा. द्वारा जिन दर्शन के पूजनीय मुनिजनों की परम्परा, उनके जीव प्रेम,  त्याग, संयम, समर्पण, मानव उत्थान को बताने वाली स्तुति की रचना की| जिसका मैंने भावानुवाद करने का प्रयास किया है| अगर अनुवाद में किसी प्रकार की त्रुटी हो तो क्षमायाचना|
जय जिनेद्र
सुगालचन्द जैन 
चेन्नई, तमिलनाडु

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