संघ व समाज का परिचय एवं रत्न व्यवहार के दायरे में वृद्धि की आवश्यकता
जैन धर्म में दो शाखाएँ है श्वेताम्बर एवं दिगम्बर| श्वेताम्बर संघ में ओसवाल, पोरवाल एवं वीरवाल समाज (नवीन निर्मित समाज) आते हैं| वहीं उत्तर भारतीय दिगम्बर संघ में अग्रवाल, खण्डेलवाल, श्रावगी आदि समाज आते हैं| इन्ही जैन अनुयायियों को कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश में अलग-अलग नाम से पहचाना जाता है|
श्वेताम्बर जैन संघ की मुख्यतः तीन शाखाएँ हैं मंदिरमार्गी, स्थानकवासी एवं तेरापंथी| इन तीनों शाखाओं की अपनी-अपनी धर्मसंघीय व्यवस्थाएँ हैं|
मंदिरमार्गी संघ – इस संघ में अलग-अलग गच्छ हैं एवं प्रत्येक गच्छ के अलग आचार्य| हर गच्छ में दीक्षा एवं गुणवत्ता के आधार पर आचार्यपाद का अलंकरण दिया जाता है| अतः इस संघ में आचार्य भगवंत, संतगण एवं श्रावकगणों की संख्या अन्य संघों की अपेक्षा अधिक है| यह संघ अपने सम्पूर्ण कार्य “सकल जैन संघ” के नाम से करता है एवं इनका सधार्मिक वात्सल्य तीनों संघों के प्रति स्पष्ट रूप से प्रकट होता है| अधिकतर इनमें कोई भेद-विभेद नहीं दिखाई देता|
स्थानकवासी संघ – इस संघ की भी बहुत सी शाखाएँ हैं जैसे श्रमण संघ, जयमल संघ, रत्नहितेषी संघ इत्यादि| इसमें हर उपशाखा के अलग-अलग आचार्य हैं| इस संघ में अधिकतर कार्य उपनाम के साथ “स्थानकवासी” शब्द को साथ लेकर किये जाते है| स्वामीवात्सल्य भाव प्रथम स्थानकवासी समाज के लिए तदुपरान्त अन्य संघों के प्रति प्रकट होता है|
तेरापंथी संघ – इसकी कोई उप शाखाएँ नहीं है| इसके एक प्रमुख आचार्य होते है उन्ही के निर्देशानुसार पूरा संघ कार्य करता है| इस संघ में स्वामीवात्सल्य भाव सिर्फ तेरापंथी धर्मसंघ से जुड़े हुए व्यक्तियों तक ही सीमित है|
इन तीनों धार्मिक संघों के मुख्यतः समाज है ओसवाल समाज, पोरवाल समाज, वीरवाल समाज इत्यादि| जिनका परिचय है:-
ओसवाल समाज में बीसा, दसा, पांचा एवं ढाई समाज है| इस समाज के व्यक्ति तीनों ही धर्मसंघों से जुड़े हुए हैं| पहले इनमें आपस में बेटी व्यवहार जिसे पहले रत्न व्यवहार कहा जाता था नहीं होता था| शायद वर्तमान ओसवाल समाज के 95% से अधिक व्यक्ति इस भेद से अनभिज्ञ हैं| परन्तु कालांतर में यह खाई पट गई एवं वर्तमान में बिना किसी झिझक व बिना साम्प्रदायिक संघ के भेदभाव से रत्नव्यवहार होता है| पोरवाल समाज के समाज के बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है लेकिन इतना अवश्य सुनने में आता है कि अब ओसवाल-पोरवाल में बिना कोई भेदभाव के रत्न व्यवहार होता है एवं समाज ने इसे स्वीकार कर लिया है|
वहीं दिगंबर संघ एवं श्वेताम्बर संघ के विभिन्न समाजों में भी आपस में रत्न व्यवहार नहीं होता था और वर्तमान में भी दोनों संघों के समाजों के मध्य रत्न व्यवहार नगण्य के बराबर जानकारी में आते हैं|
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 46 लाख जैन हैं| आज से 500 वर्ष पूर्व जैनों की संख्या करोड़ों में थी| जैन राजा थे, जैनियों का अपना वर्चस्व था| समय के साथ-साथ जैनियों की संख्या कम हुई, हम राजा से व्यापारी बने| वर्तमान में नवयुवक व्यापार के झंझट से दूर होकर नौकरी की तलाश में भटक रहे है| विवाह में अडचने आ रही है| 25-30 वर्ष के युवक-युवतियों का विवाह न होना आम बात हो गई है|
अतः आवश्यकता है ऐसे जैन समाज के निर्माण की जिसमें श्वेताम्बर, दिगम्बर, खण्डेलवाल, ओसवाल, पोरवाल, वीरवाल आदि समाज बेझिझक आपस में रत्न व्यवहार करें न कि धर्मसंघ के नाम से विभाजित होकर अपनी डफली अपना राग अलापे| स्वामी वात्सल्य का भाव भी एक संघ या समाज मात्र के लिए नहीं अपितु जैन मात्र के लिए करने की चेष्टा करनी चाहिए|
साथ ही हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि भगवान महावीर के जैन धर्म को किस प्रकार जन-जन तक पहुंचाएं| ताकि संसार में शांति और अमन स्थापित हो सकें| हमें तालिबानी विचारधारा “मेरा तो मेरा है परन्तु तेरा भी मेरा हैं” से हमेशा दूर रहना चाहिए|
मैंने कहीं पढ़ा था कि एक व्यक्ति को सम्यकत्वी बनाने से तीर्थंकर गौत्र का उपार्जन हो सकता है| यदि यह विचार सही है तो फिर हम पहले जन्म से नहीं कर्म से सम्यकत्वी बनें और एक व्यक्ति को सम्यकत्वी बनाने का हर संभव प्रयास करें| जिससे तीर्थंकर गौत्र बंध कर्म हमें अनायास ही प्राप्त होगा|
समय की मांग है कि संघ के कर्ताधर्ता हमारे पूजनीय एवं महान साधु-सन्त सभी समाजों को जोड़ने का प्रयास करें न कि विभाजन का| शादी-विवाह ओसवाल, पोरवाल, अग्रवाल, खण्डेलवाल, वीरवाल व अन्य जो भी जैन समाज के अंग है आपस में निर्बाध रूप से हो| क्योंकि हममें आपस में कोई भेद नहीं है, हमारे 99.99 प्रतिशत विचार मिलते है| सिर्फ 0.01 के लिए आपस में कलह नहीं करें| यह लेख मैंने अपनी जानकारी के अनुसार पूर्ण सत्यता से लिखने का प्रयास किया है फिर भी अगर किसी तरह की त्रुटि हो तो क्षमा याचना|
जय जिनेन्द्र
सुगालचन्द जैन
चेन्नई, तमिलनाडु
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