संघ व समाज......

 संघ एवं समाज

10 अगस्त 2021 के जिनवाणी अंक में श्रीमान डॉ. धर्मचन्द जी जैन का सम्पादकीय लेख “संघ एवं समाज में भेद” को पढने का अवसर मिला| इस लेख में आदरणीय धर्मचन्द जी जैन ने संघ एवं समाज को अत्यंत सुन्दर एवं सारगर्भित रूप में पारिभाषित किया है| साथ ही संघ एवं समाज दोनों के स्वरूप, उद्देश्य एवं सीमाओं पर चर्चा करते हुए संघ एवं समाज की लक्ष्यगत एवं स्वरूपगत भिन्नता को बड़े ही सुन्दर तरीके से स्पष्ट किया है| इस आलेख का अध्ययन करने के पश्चात मन में आया कि इस आलेख के कुछ अंश आपके साथ साझा करते हुए अपने विचार आपके समक्ष प्रस्तुत किए जाए| 

आदरणीय डॉ. धर्मचन्द जी जैन लिखते हैं:-

1. “समाज व्यक्तियों के समूह से बनता है, जिसमें पारस्परिक वैचारिक, वाचिक एवं अन्य लेन-देन का व्यवहार होता है| समाज में कई उत्सव होते है विवाह, जन्म आदि के समारोह होते हैं| लोग परस्पर मिलते-जुलते हैं, एक दुसरे के हानि-लाभ से जुड़े रहते हैं|” 

2. “संघ समाज से भिन्न होता है| यह संघ मात्र व्यक्तियों के समूह या संघठन का सूचक नहीं है, अपितु इसमें आध्यात्मिकता एवं व्रत के पालन का तत्व सन्निहित रहता है| इसका लक्ष्य संसार के दुःखों से छुटकारा है तथा उस लक्ष्य की पूर्ति के लिए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यकचरित्र को जीवन में स्थान देना है|”

3. “संघ में श्रद्धा की आवश्यकता होती हैं और समाज में पारस्परिक विश्वास की| समाज विश्वास के बल पर चलता है और संघ श्रद्धा के बल पर दोनों की अपनी आचार संहिता होती हैं|”

संघ एवं समाज की उपरोक्त अवधारणाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि संघ एवं समाज दोनों का ही अपना-अपना स्वरूप, क्रियाशैली एवं सीमाएँ हैं| दोनों को ही अपने-अपने दायरे में रहकर कार्य करने का प्रयास करना चाहिए|

लेकिन विगत कुछ समय से देखने में आ रहा है कि संघ समाज की कार्य शैली को अपनाता जा रहा है| संघों में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित कर सामाजिक मिलन-जुलन का स्थान बना दिया गया है| शनैः शनैः संघ में आत्मउत्थान के अतिरिक्त अन्य सब कार्य होने लगे हैं| जहाँ संघ के पदाधिकारियों का चुनाव चरित्र की प्रधानता को देखकर होना चाहिए वहां अब धन को प्रधान स्वीकार कर पदाधिकारी चुने जाने लगे हैं| ऐसे पदाधिकारीयों द्वारा जैन दर्शन के उत्कर्ष में वृद्धि तो दूर अपितु जैन दर्शन को हानि ही पहुंचाते हैं|

पहले समाज आपसी विश्वास एवं लेन-देन के कारण व्यापारिक क्षेत्र में आगे बढ़ा| लेकिन समाज में आपसी विश्वास विगत अनेक वर्षों से नीचे गिरता आ रहा है| जैसे-जैसे समाज में विश्वास रूपी नींव कमजोर हुई समाज का सामान्य व श्रेष्ठी वर्ग अब नौकर वर्ग में तब्दील हो रहा है|

अतः आवश्यकता है हमारे साधु-समाज को आगे आकर संघ और समाज को अपनी-अपनी धुरी पर रहते हुए कार्य करने की प्रेरणा देने की| 

जब संघ एवं समाज दोनों के अपने-अपने उद्देश्य, स्वरूप, सीमाएँ एवं नियमावली निर्धारित है तो संघ एवं समाज दोनों को उसका अनुसरण करने की आवश्यकता है| हमारा प्रयास होना चाहिए कि संघ को समाज का सहयोग प्राप्त हो परन्तु कभी भी संघ समाज के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करें| तभी संघ एवं समाज दोनों स्वस्थ, उन्नत रहेंगे|

जय जिनेन्द्र

सुगालचन्द जैन 

चेन्नई, तमिलनाडु

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