विचारणीय चिंतन.....आगम के अनुसार।

 🌻जय महावीर🌻

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🌹श्रावक समाज गहन चिंतन करें:--👇

🔹जैन धर्म में साधु या गुरु किसे माना है? 👇

भगवान महावीर ने महाव्रत धारी साधु को साधु माना है और स्पष्ट बताया है कि जो निग्रन्थ प्रवचन देता हो, वोही जैन साधु है। जैन साधु को जो महाव्रत धारी है,उसको लौकिक विषयों पर उपदेश देना नही कलपता है क्योंकि उससे राग द्वेष होने की संभावना रहती है। साधु के प्रवचन भगवान की आज्ञा के अनुसार ही होने चाहिए ऐसा आगम शात्रों में वर्णित है। निग्रन्थ प्रवचनों को ही सत्य माना गया है।।

क्या किसी जैन साधु का गृहस्थ के शादी ब्याह के विषय पर उपदेश देना आगम सम्वत है ? जरा चिन्तन करें।

क्या मूर्तिपूजक को द्रव्यपूजा करने के कारण उसको प्रथक मानना उचित है? क्या यह राग द्वेष नही बढ़ाता?

जैन आगम (स्थानांग सूत्र) में श्रावक को साधु के माता पिता की उपमा दी गई है। अगर कोई साधु आगम के विपरीत प्ररूपणा करता है तो श्रावक को विनय पूर्वक उस साधु को सही आगम सम्वत सही मार्ग बताने का उस श्रावक का दायित्व है।

सच्चा श्रावक वोही है जो साधु के संयम में साधक बने, बाधक नहीं।

अगर कोई श्रावक यह जानते हुए भी की साधु की भाषा आगमों के अनुकूल नही है और राग द्वेष का कारण है और फिर भी वो श्रावक उसकी बात की अनुमोदना करता है तो वो श्रावक उस साधु का हितैषी नही हो सकता है। ऐसा श्रावक स्वयम के कर्मों का भी बंध करता है और साधु के संयम में भी बाधक बनता है।।

मेरे लिखने में या विचारों में कहीं भूल हो तो क्षमा करें।।

मिच्छामि दुक्कड़म।।

🌹जय जिनेन्द्र🌹

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।।कैलाश राज सिंघवी।।

।।एक पथ-एक पंथ।।

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