किसान आंदोलन किसानों के मुद्दों के नाम पर क्या सियासत का सफ़र करता नहीं दिख रहा!
क्या किसान नेता किसानों की आड में खुद को चमकाने की कोशिश नहीं कर रहे
फोटो:साभार सोशल मीडिया
फर्स्ट न्यूज कार्यालय डेस्क:सोशल मीडिया से प्राप्त खबर यह अंदेशा जता रही है कि किसान नेता अब किसान आंदोलन के नाम पर चुनावी पटल पर अपना जोर दिखाते हुए भाजपा पर दबाव बनाना चाहते है शायद तभी पश्चिम बंगाल में जोर पकड़ती भाजपा के रथ को रोकने के लिए किसान नेता बंगाल में अपना दमखम दिखाने की सोच रहे है अर्थात भाजपा से सीधी लड़ाई में दो दो हाथ कर रही तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी का सहारा बन रहे है।
किसान आंदोलन के नेता अगर आंदोलन के लिए किसानों का समर्थन लेने के लिए देश भर में दौरे करते है तो वह सवाल नहीं बन सकता मगर सियासती तौर पर अगर अखाड़े में सीधे या टेढ़े उतरते है तब यह आंदोलन फिर सियासती भी लोग कह सकते है।
अब सवाल यह भी है कि इतनी लंबी अवधि तक धरना ,हिंसक प्रदर्शन,देश विदेश में देश विरोधी ताकतों का साथ लेने के बाद भी जब बात नहीं बनी तो क्या आंदोलनकारी को सियासती हो जाना चाहिए!
अब इस विषय पर लोगों के मन में सवाल उठने स्वाभाविक है..
लोकतंत्र में चुनाव कोई भी लड़ सकता है पर प्रदर्शन से सियासत की बात क्या जनता के गले उतर सकती है!
क्या जनता आपको सियासत में पावर पाने के उपयुक्त समझती है!
क्या किसानों के नाम पर यह अपनी नेतागिरी की रोटी सेंकने की कवायद नहीं है!
क्या किसानों की महापंचायत के नाम पर हो रही सियासत को देश की जनता नहीं समझ रही।
किसान नेताओं का यह बयान ममता बनर्जी के लिए सियासती कुछ लाभ को देख कर सुखद हो सकता है पर क्या किसान नेता भाजपा का रथ रोक पाएंगे!
अगर उनकी सारी कोशिश के बाद भी भाजपा पावर सेंटर बन गई तब क्या ये लोग फिर किसी दूसरी जगह अर्थात क्षेत्र में सियासती रूप से सामने आने का साहस जुटा पाएंगे!
बंगाल में अगर भाजपा का रथ इन्होंने रोक भी दिया तब भी क्या सरकार को झुका पाएंगे।
कुछ सवाल अपना समाधान चाहते है।
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