नामवर एक नाम भर नही...

*नामवर एक नाम भर नहीं*

आज नामवर सिंह जी का अवतरण दिवस है।अपने जीवन के एक-एक क्षण को पढन -लेखन में डूब कर भरपूर जीने वाले ही कोई सार्थक सृजन कर पाते हैं।काव्यात्मक पथ से शुरुआत करने वाला जियन पुर का पुनीत ही नामवर बना और अपने जीवन को साहित्यिक कसौटी पर बखूबी घिसते हुए स्वयं को निखारने  का काम किया।समालोचनाओं आलोचनाओं के साम्राज्य को अपने नाम करने वाले नामवर ही हैं।एक युग पैदा किए नामवर युग, जिसमें अनेक प्रतिष्ठित ग्रंथों की रचना कर बैठे।उनका शुरुआती जीवन  संघर्षमय रहा।पर याचना रहित भी रहा। जीवन की कठिनाईयों में स्वयं को संयमित रखते हुए अपने सभी दायित्वों को बखूबी निभाया। आज उनके द्वारा किए गए कार्य बहुत ही श्रेष्ठ है। हिंदी भाषा के लिए उनका योगदान बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।अगर हम राष्ट्र और समाज की दृष्टि से बात करें तो नामवर सिंह को युग प्रवर्तक कहने में संकोच नहीं होगा।वे सदैव जरुरतमंदों और निरीह लोगों के समर्थक रहे।देश में हिटलरी शासनकाल से भी वे क्षुब्ध रहते थे।वाचिक परंपरा के सजग प्रहरी नामवर जी ने सदैव अपने वक्तव्यों द्वारा सम्पूर्ण भारत में अलख जगाया।और जनता को जागरूक किया।आज उनके पद चिन्हों पर चलने वाला कोई नहीं है।यह प्रश्न मेरी पुस्तक *पुष्पा के सवाल नामवर के ज़वाब*में वर्णित है।कि जब भी वे मुड़ कर देखते हैं।उनके पद चिन्हों के अलावा कोई और पद चिन्ह नजर नहीं आता।यह बात उन्हें आहत भी करती रही।मैं उन्हें बाबू जी संबोधित करती हूं ,और उनके सानिध्य में अपने लेखन को निखारने संवारने का दुर्लभ संयोग प्राप्त हुआ है।उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर लेखन करती रही। जहां तक मैंने उनके व्यक्तित्व को समझा वह बहुत ही सहज और सरल रहें हैं। उनके भीतर की संवेदनशीलता की  कोई मिशाल नहीं दी जा सकती है। बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति होने के नाते उनके विरोधी भी बहुत हुए। लेकिन यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि उनके सभी विरोधी भी उनके प्रसंशक रहे।ऐसे व्यक्तित्व के धनी रहे हैं नामवर सिंह।आज भी यही लगता है कि वे हमारे आस पास ही हैं। विशालकाय हृदय में सदा सभी के लिए स्नेह और आदर रखने वाले महान विभूति इस दुनिया से दूर चले गए हैं।पर अपने द्वारा अपने नाम के अर्थ को सार्थक सृजन द्वारा स्वयं ही  स्थापित किया है।
उनके कृतित्व पर अनेक लोग चर्चा करेंगे। लेकिन इतना अद्भुत व्यक्तित्व मैंने कहीं किसी में भी नहीं देखा है। *नारायणी साहित्य अकादमी* एकमात्र उनके द्वारा स्थापित न्यास है जिसके लिए मैं जीवन भर अंतिम सांस तक समर्पित हूं। उनके द्वारा अथाह स्नेह दुलार  मुझे मिला है और आज भी मिल रहा है।यह सब समझाने के लिए बहुत ही सहज हृदय चाहिए।मेरे जैसी अदना सी लेखिका को प्रतिभावान और विदुषी कहना बहुत ही बड़ी बात है।एक लेख गगनांचल में छपा था।मेरा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पर मैं भेज कर भूल भी गरी थी।वह पत्रिका नामवर जी के पास  पहले पहुंची। उन्होंने तुरंत मुझे फोन किया।और कहा कि बेटा सदैव लेख लिखा करो *एक दुर्लभ व्यक्ति*नामक शीर्षक से प्रकाशित वह लेख उन्हें बहुत ही अच्छा लगा।हां मैं पत्रिकाओं से ज्यादा नहीं जुड़ पाई।यह मेरी कमी रही।आज हमारा देश किस दिशा में जा रहा है यह भी उनके चिंतन में सदैव रहता था।आज हमारे देश को उनके विचारों को आत्मसात करते हुए समरसता लाने का प्रयास करना चाहिए।ऐसे युगप्रवर्तक विद्वत पुरुष सदियों में बिरले ही पैदा होकर धरा पर आते हैं।आज इक्कीसवीं सदी में भी हम क्या जाति धर्म,ऊंच नीच के भेद भाव से उपर उठ पाए हैं? नहीं बल्कि आज समाज में यह दूषित भाव अपना वर्चस्व स्थापित किए हुए है।और इसके कारण हमारे समाज में समरसता का जरा भी समावेश नहीं हो पा रहा है।आज नामवर सिंह जी के विचारों को अपनाने की जरुरत है।नामवर जी हमारे देश के युवाओं में अति प्रिय।अपनी बात को यहीं विराम देती हूं।
पुष्पा सिंह-दिल्ली

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