*में भी रहा हूँ एमरजेंसी के काले अध्याय का प्रत्यक्षदर्शी*
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*एमरजेंसी में 45 वर्ष पूर्व आज ही के दिन बालोतरा जी श्री बांठिया जी, जसोल से श्री भंवरलाल जी सालेचा PTI, पचपदरा के सालेचा बन्धुओं को बिना किसी चार्जशीट के जेल भेज दिया था, पढ़ें पूरे आंखों देखे तानाशाही भरे हालात..*
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*(लेखक: गणपत भंसाली,जसोल-सूरत)*
*25 व 26 जून 1975 के दिन का वो काला अध्याय जो कि सचमुच में लोकतंत्र को बंधक बनाने का दिन था। जिस दिन कांग्रेस पार्टी की नेता एंव उस दौर की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने तानाशाह रवैया अख्तियार कर राष्ट्रपति श्री फखरुद्दीन अली अहमद को विश्वास में लेते हुए रातो रात एमरजेंसी लागू कर दी थी।
आपातकाल यानी आपके-हमारे अभिव्यक्ति व्यक्त करने व लिखने आदि के अधिकारों का हनन कर देना। ये उल्लेखनीय हैं कि एमरजेंसी अमूमन युद्ध के समय, आर्थिक संकट के दौर में व राजनैतिक तौर पर देश मे अस्थिरता के माहौल में लागू होती हैं, हालांकि 71 के युद्ध के दौरान मेरी व मेरे से कुछ छोटी उम्र के लोग एमरजेंसी के हालातों से रूबरू हो चुके थे। लेकिन इंदिराजी द्वारा राजनैतिक संकट से उभरने हेतु जो आपातकाल 1975 में लागू किया गया, करीब 45 वर्ष पुराने वे दृश्य मेरे आंखों के आगे आज भी घूम रहे हैं। उस दौर में मेरी उम्र करीब 24 वर्ष की थी। तथा पत्रकारिता से ताजा-ताजा जुड़ाव हुआ ही था। युवा खून था, अतः कलम चलाने हेतु बेताब सा रहता था।
हिंदी दैनिक अख़बार "राजस्थान पत्रिका" श्री कपूरचंद जी क़ुर्लिश के सम्पादन में उन दिनों राजस्थान के विभिन्न संभागो में जयपुर से प्रिंट होकर आता था। संयोग वश में उन दिनों में बालोतरा में "राजस्थान पत्रिका" का संवाददाता नियुक्त हुआ ही था। चूंकि मेरा निवास बालोतरा के समीपवर्ती जसोल नगर था। अतः खबरें लिख कर जयपुर भेजनी होती थी। आज के दौर की भांति इंटरनेट सुविधा नही थी, और ना ही वॉट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि सोशल मीडिया अस्तित्व में थे। अतः जरूरी खबरें टेलीग्राम से तथा अन्य खबरें बस या ट्रेन तथा पोस्ट के माध्यम से भेजी जाती थी।
जब एमरजेंसी लगी तो RSS से जुड़े वरिष्ठ स्वयंसेवको को जेल में डाल दिया गया था। मेरे ही गांव जसोल के अध्यापक एंव PTI स्व: श्री भंवरलाल जी सालेचा (जैन) को बाड़मेर जेल भेज दिया गया था, कुछ महिनो पश्चात उनके समक्ष कुछ शर्तों के साथ जेल से बाहर आने का विकल्प होने के बावजूद स्वाभिमान के तौर पर उन्होंने जेल में रहना ही उचित समझा।
बालोतरा से जनसंघ पार्टी के वरिष्ठ एंव झुझारू नेता श्री चम्पालाल जी बांठिया को जोधपुर जेल भेजा दिया गया था, श्री बांठिया ने भारत माता की जय, एमरजेंसी का काला कानून वापस लो जैसे नारे लगाते हुए गिरफ्तारी दी थी ।
बालोतरा के ही श्री शंकर जी चारण को भी जेल भेजा गया था। पचपदरा निवासी व जोधपुर प्रवासी सेठ श्री गुलाब चंद जी सालेचा (जैन) परिवार से श्री अमीचन्द जी सालेचा तथा उनके पुत्र श्री नरपत चन्द सालेचा एंव श्री गौतम चन्द सालेचा तथा इसी परिवार के श्री छगनराज जी सालेचा के पुत्र श्री रविन्द्र जी सालेचा को जोधपुर जेल में रखा गया था। इसमें श्री अमीचन्द जी सालेचा को "मीसा" कानून के तहत गिरफ़्तार किया था। शेष ने एमरजेंसी जैसे काले कानून का विरोध करते हुए गिरफ्तारी दी थी। बाड़मेर,चौहटन, बालोतरा, जोधपुर आदि शहरों-कस्बों के कई जनसंघी नेताओं व RSS स्वयंसेवको को "मीसा" कानून के तहत जेल में भेज दिया गया था, जिसमें श्री रिखब दास बोहरा, श्री आसुलाल बोथरा, श्री चेलाराम सिंधी, श्री पुखराज गुप्ता, श्री गोविंद राम खत्री, श्री ओमप्रकाश चांडक, श्री नारायण दास खत्री, श्री पारसमल सोनी, श्री अशोक गिग्गल, श्री भंवरसिंह सोढा आदि नेता थे। कुछ को गिरफ्तार किया गया व कुछ लौगों ने DRI के तहत एमरजेंसी के विरोध में गिरफ्तारी दी थी। एमरजेंसी में सारे मौलिक अधिकारों पर पाबंदी रूपी ताला जड़ दिया गया था। अगर किसी का पुलिस कर्मियों से अतीत में कोई वैर-विरोध रहा था, तो एमरजेंसी में वह शख्स अलबत्ता पुलिस-प्रशासन से डरा-सहमा हुआ ही रहता था। मुझे भी ये खामियाजा भुगतना पड़ा था। इस लिए कि मैंने प्रशासन की लापरवाही की पोल खोल कर रख दी थी, मैंने "राजस्थान पत्रिका" के जयपुर संस्करण में जसोल के एक अनसूचित जाति के मेघवाल बन्धु की जबरन नसबन्दी से जुड़ी आधे पेज से बड़ी स्टोरी राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित कराई तो जसोल थाने के उस दौर के पुलिसकर्मियों की त्योरियां चढ़ गई थी। उन दिनों समीपवर्ती शहर बालोतरा या और कहीं भी जाना होता तो या तो बस पकड़नी पड़ती थी या फिर पैदल जाना होता था, बहुत कम लोगों के पास साइकिल जैसा साधन उपलब्ध रहता था।
में बालोतरा जाने हेतु जसोल बस स्टेंड पर पहुंचा ही था कि वहां सोनी जगचन्द-भुरचन्द प्याऊ के निकट मुड्डे पर बैठे पुलिस कर्मी मुरली शर्मा ने मुझे रोका और रोफिले आवाज में कहा- क्यों गर्मी ज्यादा चढ़ गई हैं ? में सकपकाया कि आखिर मेरे से ऐसी क्या खता हो गई? मैंने कहा साहब क्या हुआ? पुलिस कर्मी ने कहा अब अनजान ऐसे बन रहे हो जैसे कुछ जानते भी नही? फिर उस पुलिस कर्मी ने अपनी आवाज औऱ तेज की कि उस मेघवाल जाति के व्यक्ति की नसबंदी वाली खबर तूने नही छपवाई थी क्या? तो मैंने कहा कि में संवाददाता हूं अतः समाचार तो मैंने ही भेजा था राजस्थान पत्रिका में। बहरहाल जितनी धौंसपट्टी देनी थी उस पुलिसकर्मी ने दे दी। इससे ज्यादा तो वो एमरजेंसी के बावजूद इस लिए कतराता था कि आखिर एमरजेंसी आज नही तो कल हटनी ही हैं।
में नया-नया पत्रकारिता से जुड़ा ही था। अतः डर व संकोच के मारे जयपुर पत्रिका ऑफिस में इस वाक्ये से अवगत करा नही पाया, कि पता नही वहां से क्या जवाब मिलेगा? लेकिन में बालोतरा पहुंच कर पत्रकार संघ बालोतरा के अध्यक्ष श्री मनफूल सिंह राजपुरोहित से मिला व पुलिसकर्मी द्वारा धमकाने सम्बन्धी घटना से अवगत कराया तो उन्होंने कहा कि डरने की कोई जरूरत नही। इस सम्बंध में मैंने बाड़मेर के ख्यातनाम पत्रकार श्री भुरचन्द जैन को भी पत्र लिख कर घटनाक्रम से अवगत कराया तो उन्होंने भी पत्र लिख कर आश्वस्त किया कि घबराने जैसी कोई बात नही। बहरहाल एमरजेंसी का दौर ऐसा भयावह दौर था कि हर कोई बिना किसी अपराध के घबराहट में तथा डरा-सहमा रहता था।
क्या दुकानदार औऱ क्या आम आदमी। ये वो दौर था जब इंदिरा गांधी के आदेश पर जबरन नसबन्दी करने का सिलसिला बड़े पैमाने पर बना हुआ था। हर कोई व्यक्ति घर से बाहर निकलने से डरता था, कि कब कोई जबरन नसबन्दी न कर बैठे? क्योंकि स्वास्थ्य अधिकारियों को दिया गया टारगेट जो पूरा करना था। अखबारों की खबरों पर भी सेंसर रूपी तलवार लटकी हुई थी। प्रिंटिंग प्रेस उस दौर में मैन्युल हुआ करती थी, जिसमें बॉक्स में एक-एक अक्षर छोटे चिमटे से सेट करना पड़ता था। कोई भी प्रिंटिंग प्रेस मालिक राजनैतिक मटेरियल्स प्रिंट करने से साफ इंकार करता था।
सरकार के खिलाफ न एक शब्द लिख सकते ना ही बोल सकते, और नाही हड़ताल-विरोध जैसे मौलिक अधिकारों का उपयोग कर सकते थे। अनेक नेता भूमिगत हो गए थे।कई-कई नेता वेश परिवर्तन कर बाहर निकलते थे। रेडियो के समाचार सरकारी आचार सहिंता के तहत प्रसारित होते थे। राजनैतिक वातावरण के टेलीग्राम तक भेजने से लोग कतराते थे। हालांकि में किशोरावस्था से ही जनसंघ की विचारधारा से जुड़ा हुआ हूं, लेकिन में RSS का न तो स्वंय सेवक रहा औऱ ना ही में किसी शाखा में बचपन से अब तक गया हूँ। लेकिन में RSS की नीतियों का प्रशंसक अवश्य रहा हूँ, हो सकता हैं कि इसी के चलते जसोल पुलिस थाने में मेरा रिकॉर्ड बतौर RSS कार्यकर्ता के रूप में दर्ज हो गया हो।
अतः जैसे ही एमरजेंसी लगी तो में उन दिनों हमारी जसोल में स्थित एम महेंद्रा डाइंग मिल्स (महावीर चंद महेंद्र कुमार) के सेल्समेन के रूप बेंगलोर व मद्रास आदि दक्षिण भारत के शहरों में टूर पर था, तो मेरे बड़े भाई साहब श्री अमीचन्द जी भंसाली का फोन से समाचार मिला कि RSS कार्यकर्ता के तौर पर पुलिस की तुम पर निगाह बनी हुई हैं। हालांकि में कुछ दिनों पश्चात मेरे कस्बे जसोल पहुंचा तो पता चला कि पुलिस बड़े जनसंघ नेताओं तथा राष्ट्रीय स्वंय संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवको पर कड़ी निगाहें रखी हुई हैं। उस मे से अनेकों को गिरफ्तार कर बाड़मेर व जोधपुर की जेलों में भेज दिया गया था। लेकिन एमरजेंसी के विरोध में जेल भरो अभियान चलने से जेलों में जगहें कम पड़ने लग गई थी। जो भी खबरें जयपुर, दिल्ली आदि से आती थी वे सेंसर के तहत तथा पाबन्दी युक्त आती थी। आज के दौर की तरह विभिन्न न्यूज चैनलों की भरमार नही थी, दूरदर्शन ताजा-ताजा शुरू हुआ ही था, लेकिन गांवों-कस्बों में अलबत्ता पहुंच नही पाया था। जैसा कि पहले बता चुका हूं कि खबरों का एक मात्र माध्यम आकाशवाणी जैसा रेडियो ही था।, जो कि सरकार की भोंपू की भूमिका में ही था।, हां उस दौर में BBC लन्दन की रेडियो पर हिंदी सर्विस सही खबरों का एक सटीक माध्यम था। तथा वॉइस ऑफ अमेरिका जैसे रेडियो स्टेशन भी वैकल्पिक माध्यम थे।
उस दौर में लोग BBC लन्दन पर पूरा भरोसा करते थे। आपातकाल में समग्र क्रांति आंदोलन के जनक श्री जयप्रकाश नारायण, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लालकृष्ण आडवाणी, विजयाराजे सिंधिया, चन्द्रशेखर, श्री भैरोसिंह शेखावत आदि नेताओं को जेल भेज दिया गया था। जॉर्ज फर्नांडिस व वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी आदि वेशभूषा बदल एक से दूसरी जगह पहुंच आगे की रणनीति की खबरें पहुंचाते थे, श्री नरेन्द्र मोदी तो सरदारों के वेश में प्रिंट किये हुए पर्चे पहुंचाने की भूमिका निभा रहे थे।
एमरजेंसी भी कम नही रही, आपातकाल 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक यानी लगभग 21 माह तक रहा। लोग इस काले कानून से डरे-सहमे रहे, जब एमरजेंसी हटी तब में ट्रेन द्वारा विजयवाड़ा से मुंबई की और जा रहा था, तब मार्ग के किसी स्टेशन पर यह खबर मिली कि एमरजेंसी हटा दी गई हैं, तो लोगों के चेहरे की रौनक देखने लायक थी। आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सही कहा कि एमरजेंसी लोकतंत्र पर एक काला धब्बा था। तथा आपातकाल से मिले सबक को याद रखना चाहिए। बस यह सुन मेरी कलम भी चल पड़ी....*
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*गणपत भंसाली* *(सूरत-जसोल)*
*Ganpatbhansalijasol@gmail.com*
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