_*देश की राजधानी दिल्ली और हमारे सोच का स्तर*_
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_रामचन्द्र सारस्वत (गुरावा)_
*दिल्ली पूरे भारतवर्ष की राजधानी है ।देश की राजधानी के लोगों की सोच क्या होनी चाहिए ,उनका सोच का स्तर क्या होना चाहिए ,यह हम सबने कभी बैठकर सोचा है ।नहीं सोचा है ।अगर सोचा होता तो हम आज यह "फ्री " नाम का शब्द न तो हमारी डिक्सनरी में होता ,न हम इस "फ्री" शब्द की चर्चा बार- बार किसी के मुख से सुनने के लिए उद्यत होते ,न किसी की यह शब्द बार -बार बोलने की हिम्मत भी होती ।आज फ्री की बिरयानी ,फ्री का पानी ,फ्री की बिजली ,फ्री का ईलाज ;यह सब क्या है?क्या हम देश की राजधानी में यह सब फ्री का माल खाने के लिए बैठै हैं ,लानत है ,हमारी सोच को और लानत है ,उन नेताओं को जो हमें हमें फ्री की भीख खाने लायक समझते हैं ।*
*दिल्लीऔर उसके नागरिक तो देश की क्रीम होनी चाहिए थी ,जिनका सोच, स्वास्थ्य,रहसहन ,जीवन -स्तर देशभर के अन्य लोगों से कई गुना सम्मुनत होता ।आज विधान सभा के चुनाव हो रहे हैं ,उम्मीदवारों द्वारा यह पूछे जाने पर कि आपकी अपेक्षा क्या है तो हमारा जबाब होना चाहिए कि हमारी अपेक्षा है ,हमारे देश की राजधानी दिल्ली पैरिस से भी सुन्दर होनी चाहिए ,सडकें साफसुथरी हों ,अब्बल दर्जे की यातयात सुविधा हो , पूरा शहर प्रदुषण- मुक्त हो ,अत्याधुनिक मशीनों से सज्जित हास्पिटल व मल्टीस्पेशलिटी के क्लीनिक हों,उच्यस्तरीय संचार -व्यवस्था हो ।हमें नहीं चाहिए , फ्री के मोहल्ला क्लीनिक ,हमें नहीं चाहिए ,फ्री के रात्रि बसेरा,हमें नहीं चाहिए, झोलाछाप योजनाएं।*
*सच पूछा जाये तो "फ्री का चन्दन घिस मेरे नंदन" वाली सोच ने हमारी सोच को ही पंगु बना दिया है ।दोष इन राजनैतिक दलों का नहीं है ,दोष हमारा ही है ,जो इन्होंने हमारी कमजोर नस को पकड लिया है और उन्होंने हमारी अस्मिता से सौदा करना शुरू कर दिया है ।अब भी समय है ,हम सचेत हो जायें और लुभावने लोलीपोप देने वालों को मुँहतोड जबाब दें और उन्हें बतायें कि हमें कैसी दिल्ली चाहिए ?*
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