नन्हे बच्चों को स्कूल में कैसे सिखाया जाए!
पुराने दिनों में जब दादी नानी की कहानियों का दौर हुआ करता था तब नन्हों को स्कूल 5 वर्ष के आसपास ही भेजा जाता था उस दौर में नन्हे बच्चे अपनी माँ के पास कम व अपनी दादी नानी के पास ही अधिक खेलते थे उस वक्त प्ले स्कूल नहीं थे और न ही उनकी जरूरत भी कभी महसूस हुई क्योकि दादी नानी की स्कूल जो हुआ करती थी और उसमें बच्चे खेल खेल में दादी नानी से गणित की गिनती के पहाड़े व स्लेट में कुछ कुछ लिखना सीख लेते थे तथा इससे भी महत्वपूर्ण दादी नानी की कहानियों से बच्चों में संस्कार,परंपरा की घुट्टी भी चली जाती थी।
यह वो दौर था जब बच्चे अपनी मम्मी,पापा के पास कम बल्कि दादा,दादी,नाना,नानी के पास अधिक रहते थे और यही से वो सीखते भी थे।अंग्रेजी का ज्ञान जरूर उतना नही होता था जो आज होता है पर बच्चों के मन मस्तिष्क पर किसी प्रकार का दबाब नहीं पड़ता था।क्योंकि सब कुछ खेल खेल में होता था.।
..गणित की गिनती कंकर के खेल से सिखाई जाती थी पर अब वो दौर नहीं रहा अब प्ले स्कूल का दौर आ गया है ...अब बच्चा पैदा होते ही स्कूल की बात होने लगती है।1 वर्ष से पार होने के बाद प्ले स्कूल की तलाश हो जाती है जहां मम्मी बच्चे को निर्धारित घण्टों के लिए जैसे जमा करा कर खुद को हल्का महसूस करती है।अब यहां खिलौने होते है और आधुनिक रूप से अंग्रेजी में बोल बोल कर बच्चे को सिखाया जाता है अब बच्चे दादी नानी के अर्थ ही नही समझते इसलिए इनकी कहानियों की तो बात ही क्या करे!
आज के दौर में बच्चों के बाल सुलभ मन पर समय से पहले उसे अतरिक्त ज्ञान देने की कोशिश में उसे बलात सिखाने की कोशिश बच्चे के साथ अन्याय है इसलिए सबसे पहले यह आवश्यक है कि बच्चे पर सीखने का दबाब न दिया जाए...उसे वक्त दिया जाए...उसके मन के मुताबिक माहौल किया जाए व खेल खेल में उसे सिखाने की कोशिश हो न कि सिखाने के लिए खेल खिलाने की कोशिश हो।
हर बच्चे का मानसिक स्तर एक सा नही होता इसलिए किसी बच्चे की किसी से तुलना कर जबरन सिखाने की कोशिश में उसे डराने या पीटने की नादानी न हो।
बच्चे के मन को समझना सबसे अधिक आवश्यक है अगर उसका मन अनमना हो तो फिर उसे खेलने के लिए तब तक छोड़ दिया जाए जब तक वो खुश न हो जाये....नन्हे बच्चो का मनोविज्ञान समझना हमारे लिए अति आवश्यक है अन्यथा हम जबरन कोशिश कर नन्हों को जिद्दी बना सकते है।
प्ले स्कूल के बाद भी बच्चो को स्टोरी सुनाना आधुनिक मम्मी के लिए जरूरी है क्योंकि बच्चे जितना कहानियों से सीखते है उतना खेल से भी नही पकड़ते....कहानियों के पात्र जंगल के जानवर हो सकते है जिससे बच्चो के जेहन में हम यह जानकारी भी पहुंचा सकते है।
कुल मिलाकर बच्चो विशेषकर नन्हों को पढ़ाना, सिखाना यह रोमांचक भी है तो चुनोती पूर्ण भी है क्योंकि यहां आपको बच्चो के साथ बच्चा बनना पड़ता है उनके मूड के मुताबिक चलना पड़ता है इसलिए बच्चों के साथ बच्चे बनिये।
-संजय सनम
7278027381
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