जैन साधु की परिभाषा.....

*जो पाँच महाव्रतों से परिपूर्ण है वो ही जैन साधु है.....✍ दिनेश बालड़,  फिलखाना हैदराबाद*        


         वर्तमान की विडंबना है कि श्रावकों को पाँच महाव्रतों की जानकारी नही होने से साधुओं के आचार में शिथिलता बढ़ती जा रही है । जानकारी नही होने से साधु वेश धारण करने वालो को गुरु मान लेते है जबकि गुरु वो होते है जो पाँच महाव्रतों का सर्वथा प्रकार से पालन करते है । जो साधु इन महाव्रतों का सर्वथा प्रकार से पालन नही करते है उनको भगवान ने असाधु की उपमा दी है जो तीन काल मे भी किसी के गुरु नही हो सकते । खंडित हीरा और खंडित महाव्रत धारी साधु दोनों की कीमत एक कोड़ी की हो जाती है  ।   आइए जानते है की दिक्षा लेते समय कौनसे पाँच महाव्रतों को समग्र समाज की साक्षी से पालन करने की प्रतिज्ञा  की थी और कौनसी सावध्य प्रवृति करने से महाव्रत खंडित हो जाते है *

1. अहिंसा*

 संयम लेते समय छह काय जीवो की सर्वथा प्रकार से रक्षा करने की प्रतिज्ञा करते हुए पहले महाव्रत अहिंसा  को स्वीकार करते है  ।  जिन जिन प्रवृत्तियों से छह काय जीवों की हिंसा होती है वो है  , स्थानक , मन्दिर, धर्मशाला, धाम, अस्पताल, स्कूल आदि बनाने का उपदेश देवे ,  पुस्तक छपवावे, जुलूस निकलवावे, दुसरे गांव के लोगों को दर्शन के लिए बस आदि से बुलावे, जन्म जयन्ती , पूण्यतिथी, चादर महोत्सव आदि मनवावे, भव्य चातुर्मास प्रवेश करे , सूर्योदय पूर्व व सूर्यास्त बाद विहार करे , साधु के लिए बनवाया हुआ आहार पानी , फल, चाय आदि ग्रहण करे, ग्रहस्थ से भार उठवावे, अपना सामान वाहन से भिजवावे, बैटरी साइकिल से विहार करे , माइक , पंखा, बिजली , मोबाइल आदि का उपयोग करे या करावे , स्नान- मंजन आदि करे। इत्यादि सावध्य प्रवर्तिया मन वचन काया से करे, करावे, अनुमोदे तो  पहला महाव्रत अहिंसा भंग हो जाता है ।

2- सत्य

संयम लेते समय सभी परिस्थितियो में  सर्वथा प्रकार से सत्य बोलने  की प्रतिज्ञा करते हुए दूसरे महाव्रत सत्य  को स्वीकार करते है  । जिन जिन प्रवृत्तियों से दूसरा महाव्रत खंडित होता है वो है भगवान के बताये हुए आचार में कुतर्क लगाकर फेर बदल करे जैसे जमाने के अनुसार चलना चाहिए, पंचम आरे में कोई शुद्ध संयम का पालन नहीं कर सकता ऐसी बातों से श्रावकों को भ्रमित करना ,  निर्दोष पानी, पात्र, स्थानक, पाट आदि तो निर्दोष मिलते नहीं, आज कोई सच्चा साधु है ही नहीं ऐसे कुतर्क कहे । छह काय जीवों की हिंसा को धर्म कहे। आडम्बर को प्रभावना कहे, सर्वधर्म को समान कहे। मूर्ती को भगवान कहे। सुख शांति धन वृद्धि निरोगी काया का प्रलोभन देकर अनुष्ठान जाप करावे ,  फल आदि सचित्त वस्तु को अचित्त कहे। दही में जीव बतावे, वस्त्र सहित को मुक्ति नहीं, स्त्री को मुक्ति नहीं, इत्यादि भगवान की आज्ञा के विपरीत प्ररूपणा करे ।  इत्यादि सावध्य प्रवर्तिया  मन वचन काया से करे, करावे, अनुमोदे तो  साधुजी का दूसरा महाव्रत सत्य भंग हो जाता है। 

 *3- अचौर्य*

संयम लेते समय सभी परिस्थितियो में  सर्वथा प्रकार से चोरी नही करने  की प्रतिज्ञा करते हुए तीसरे  महाव्रत अचौर्य  को स्वीकार करते है  । जिन जिन प्रवृत्तियों से तीसरा महाव्रत खंडित होता है वो है बिना आज्ञा से मकान, पुस्तक, वस्त्र, पात्र आदि ग्रहण करे। संरक्षक की बिना आज्ञा किसी को दीक्षा दे, भगवान की आज्ञा भंग करे, गुरू की आज्ञा भंग करे, छोटी से छोटी वस्तु भी बिना आज्ञा से ग्रहण करे ।  इत्यादि सावध्य प्रवर्तिया मन वचन काया से करे, करावे, अनुमोदे तो तीसरा महाव्रत अचौर्य भंग हो जाता है ।

 *4- ब्रह्मचर्य*

संयम लेते समय सभी परिस्थितियो में  सर्वथा प्रकार से ब्रह्मचर्य पालन की  प्रतिज्ञा करते हुए चौथे महाव्रत ब्रह्मचर्य को स्वीकार करते है  । जिन जिन प्रवृत्तियों से चौथा महाव्रत खंडित होता है वो है ब्रह्मचर्य की नववाड का उल्लंघन करे, गृहस्थी के सगाई सम्बन्ध आदि करावे, शादी , जन्मदिन आदि आदि शुभकामना संदेश भेजे। अकेला साधु अकेली बहन के साथ और अकेली साध्वी अकेले भाईयों के साथ बैठे बातचीत करे, पुरुष परिसर में साध्वी और स्त्री परिसर में साधु रात्रि प्रवचन करे ,  सन्तान सुख  आदि के लिए जाप मंत्र अनुष्ठान आदि बतावे , इत्यादि सावध्य प्रवर्तिया  मन वचन काया से करे, करावे, अनुमोदे तो  चतुर्थ महाव्रत ब्रह्मचर्य भंग हो जाता है ।

*5- अपरिग्रह*

संयम लेते समय सभी परिस्थितियो में  सर्वथा प्रकार से परिग्रह न करने की  प्रतिज्ञा करते हुए पाँचवे महाव्रत अपरिग्रह को स्वीकार करते है  । जिन जिन प्रवृत्तियों से पाँचवा  महाव्रत खंडित होता है वो है साधु गृहस्थों को पैसा दिलावे, अपना बैंक बेलेंच रखे , भक्तों के धन की वृद्धि के लिए मन्त्र, तन्त्र, रक्षापोटली आदि दे, स्थानक, मन्दिर आदि के लिए चन्दा इकट्ठा करे, करावे।  पुस्तक छपवाने के लिए पैसा इकट्ठा करे या करावे। मर्यादा से अधिक वस्तु, पात्र आदि रखे। धातुओं की वस्तुएँ रखे। शिष्य आदि के लिए परिवार वालों को पैसा दिलावे। क्षेत्र, गाँव, श्रावक आदि पर ममता रखे।जैसे - ये मेरा गाँव है, ये मेरा श्रावक है, ये मेरा  क्षेत्र है यह मेरा धाम है । रस लोलुप बनकर सदोष आहार जो साधु के लिए बनाया है उसे ग्रहण करे। बहुमूल्य वस्तुएँ रखे। साथ मे वाहन या व्यक्ति रखे  इत्यादि सावध्य प्रवर्तिया मन वचन काया से करे, करावे, अनुमोदे तो पाँचवाँ महाव्रत अपरिग्रह भंग हो जाता है।

*सारांश* 

इन पाँचो महाव्रतों से परिपूर्ण साधु साध्वी अमूल्य हीरे के समान है । एक भी महाव्रत में दोष लगाना,  भंग होना या खंडित होना हीरे में आई हुई तिराड के समान है अथार्त हीरे की कीमत शून्य हो जाती है ठीक उसी प्रकार  महाव्रत खंडित साधु भी असाधु हो जाता है जो वंदनीय नही है अथार्त वह वेशधारी साधु साध्वी है । अतः उन्हें गुरु समझना जीवन की सबसे बड़ी भूल हो सकती है । *मेरा सो सच्चा छोड़कर , सच्चा सो मेरा अपनावे* तभी जीवन सार्थक हो सकता है ।

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