*यह किसने कहा कि अकबर महान् थे?*_
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••_✍️रामचन्द्र सारस्वत (गुरावा),काँगड_
*इन्सान की यह एक स्वाभाविक कमजोरी है कि वह जिस किसी के बारे में जो बचपन से ही सुनता आया है ,पढता आया है ,उसके मस्तिष्क में उस पात्र की वैसी ही तस्वीर बन जाती है ,वह चाहे गरिमापूर्ण हो या हीनपूर्वक ।उस पात्र के बारे में जो धारणा बन गई है ,उसे हटाना व मिटाना सरल नहीं है ।उन धारणाओं को मिटाने व सोच को बदलने के लिए वृहत् व पुख्ता साक्ष्यों व प्रामाणिक सबूतों की आवश्यकता होती है ।आश्चर्य तो इस बात का होता है कि कई वार वे अपवादिक धारणाएँ एक ऐतिहासिक कलेवर धारण करके सत्य का स्वरूप बन जाती हैं । बचपन से ही हम सुनते व पढते आये हैं ,अकबर महान् !अकबर महान् !अकबर के विषय में क्या आपने कभी सोचा है कि अकबर क्यों महान् थे ;क्योंकि हमें और हमारे पूर्वजों ने इसके विपरीत कभी कुछ सोचने व पढने का अवसर ही नहीं दिया ;इसलिए हमने इसके विपरीत कभी अन्यथा सोचने का साहस हीनहीं किया ।हमने यह जरूर पढा व सुना था कि महाराणा प्रताप ने अनेक यातनाएँ झेलकर भी मेवाड़ की आजादी के लिए अकबर से बहुत लम्बी लड़ाई लड़ी थी ।हमने यह ही पढा था कि महाराणा प्रताप ने अनेक यातनाएँ झेलकर भी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की ।हमने यह तो अवश्य पढा था कि इक्कीस हजार राजपूतों ने यवन सेना के साथ युद्ध करके स्वतंत्रता की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी ।हमने यह भी पढा था कि क्षत्रीय कुल की असंख्य वीरांगनाएं जीतेजी आग में कूदकरअपना जोहर दिखा चुकी थीं। हमने यह भी पढा था कि महाराणा प्रताप मेवाड़ की आनबान व प्रभुसत्ता के लिए वीरान जंगलों में भटकते फिरते थे और कभी ऐशोआराम में पलने योग्य बच्चे भोजन के लिए रोते रहते थे।उनके रहने के.लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं था ।अत्याचारी मुगलों के कारण कई वार महाराणा को परोसा हुआ खाना बीच में ही छोड़ जाना पडता था ; हमारे पू्वजों की समझ में और हमारे इतिहासकारों की दृष्टि में तो फिर भी अकबर महान् थे ।*
जिस समय यवन बादशाह अकबर के हाथों में भारतवर्ष के शासन की बागडोर थी ,उस समय वीर प्रतापी अकबर के अतिरिक्त सभी राजे-रजवाड़े अपनी स्वाधीनता खोकर अकबर का दासत्व स्वीकार कर चुके थे।जोधपुर के महाराजा उदयसिंह को अपनी बहिन जोधाबाई तथा आमेर के महाराजा मानसिंह द्वारा अपनी बहिन का सम्बंध अकबर से कर देना क्या अकबर की महानता का द्योतक कहा जा सकता था या विलासिता, व्यभिचार , कामोत्सुक व वासनाओं का प्रतीक पुरूष! फिर भी वह हमारे लिए थे,अकबर महान्!**अकबर अपनी कामवासनाएं तृप्त करने के लिए आगरे के किले में महीने में एक दिन मीना बाजार लगवाता था ।उसमें केवल और केवल स्त्रियों को ही प्रवेश की अनुमति दी जाती थी । मुसलमान व्यापारियों की स्त्रियां दूसरे देशों से शिल्पजात लाकर उस मेले में बेचती थीं और राजपरिवार की स्त्रियां उस मेले में जाकर मनमानी वस्तुएं खरीदा करती थीं । लम्पटी अकबर भी वेष बदलकर वहाँ जाता था और किसी -न-किसी सुन्दर युवती को अपने आगोश में फंसाकर किले में ले जाया करता था ।एक समय पृथ्वीराज की पत्नी किरण जो आगरे में ही अपने पति के साथ रहती थी ,जो कि महाराणा प्रताप की भतीजी थी तथा महाराणा के छोटे भाई शक्तिसिंह की बेटी थी ,मीनाबाजार की सैर करने गई ,अकबर ने उसे धोखे से महलों में बुला लिया। किरण अकबर के पैशाचिक भावों को बहुत शीघ्र ही भांप गई ,लपककर एक कसकर मारी तथा सिंहनी की तरह छाती के ऊपर चढ बैठी , कमर से छुरा निकाल कर गरजकर बोली ---"ईश्वर के नाम से सौगंध खाकर बोल कि भविष्य में किसी अबला के शील को नष्ट करने का दुसाहस नहीं करूंगा । बोल ,शपथ ले ,नहीं तो अभी यह तीक्ष्ण छूरी तेरे कलेजे के खून से स्नान करेगी ।"*
*कहते हैं ,कायर अकबर प्राणों की भीख मांगने लगा तथा तत्काल वीरबाला किरण की आज्ञा का पालन किया । ऐसा था व्यभिचारी ,कामोत्तेजक ,लम्पटी अकबर ,जिसे हमारे कवियों ने ,इतिहासकारों ने ,साहित्यकारों ने महान् जैसे गरिमामय सम्बोधन से सम्बोधित किया।*
*मनुष्य के लिए सन्मार्ग ,सदाचार व सद्चरित्र से बड़ा कुछ भी महान् नहीं होता। यहाँ प्रश्न यही होता है कि फिर किस आधार पर और किसने कहा कि अकबर महान् थे ?*
_*--रामचन्द्र सारस्वत (गुरावा ) ,काँगड*_
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