धर्म के नाम पर पाखंड,आडंबर व शिथिलाचर की कड़वी हकीकत को बयान करने वाला यह आलेख.....
जैन धर्म के शास्त्र,आचार साधु,संत,आचार्य व श्रावक श्राविका को क्या निर्देशित करते है और वर्तमान में हो क्या रहा है!
कुछ अपवादों को छोड़ कर आचार्य,साधु,संत क्या कर रहे है!
श्रावक अपने नाम,रुतबे के लिए किस तरह मर्यादा तोड़ रहे है!
मर्यादा रूपी परम्पराओं की अनदेखी पर श्रावक चुप क्यों है!
ऐसे ही अनेक सवालों को आवाज देने वाला यह आलेख कुछ सोचने के लिए मजबुर कर सकता है।
*वो ही मेरे गुरु है...........✍दिनेश बालड़ , फिलखाना हैदराबाद*
जो जीवन मे अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर सम्यक रूपी ज्ञान की ज्योत जगाए वो होते है गुरु । और जो छः काय जीवो के प्रतिपालक भगवान की आज्ञा अनुरूप संयम जीवन निर्वाह कर रहे है वो ही मेरे सच्चे गुरु है ।
अज्ञानता से ओतप्रोत वर्तमान की विडंबना है कि आज हर कोई पर सम्प्रदाय वाद हावी हो चुका है | सिर्फ किसी एक या दो साधु के नाम लेकर बोलते है कि यही मेरे गुरु है जबकि भगवान महावीर कहते है कि जो अठारह दोष रहित और छत्तीस गुण सहित ऐसे जघन्य दो हजार करोड़ उत्कृष्ट नो हजार करोड़ साधक वो सब तेरे गुरु है ।
दशवैकालिक सूत्र में भगवान कहते है कि जो साधक बाल या वृद्ध अवस्था मे देश विराधना और सर्व विराधना से रहित हो , अहिंसा ,सत्य ,अचौर्य , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आदि पाँच महाव्रतो से परिपूर्ण हो । रात्रि भोजन , हिंसा , झूठ , चोरी , मैथुन और परिग्रह के सर्वथा त्यागी हो , पाँच समिति तीन गुप्ति से युक्त हो, पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस आदि छह काय जीवों के सर्वथा प्रकार से रक्षक हो , पांच इन्द्रियों का दमन करने वाले हो , परिषह और उपसर्गों में दृढ़ रहने वाले हो , बिना किसी लौकेषणा के निश्चल भाव से साधना में रमण करने वाले धैर्य गुण युक्त , धीर वीर और सरल स्वभावी शूरवीर श्रमण ही सच्चे गुरु है।
वर्तमान के शिथिलाचारी भौतिक वातावरण के सामने समय समय पर वाहवाही और शाबासी से कोसो दूर रहने वाले धर्म से डिगते प्राणी को स्थिर करने वाले साधक ही सच्चे गुरु होते है जो विषम परिस्थितियो में भी पूर्ण रूप से साधना में लीन रहते है । आगम ज्ञान के अभाव में वर्तमान में लोग बहुत बड़े भ्रम में जीवन यापन कर रहे है । भगवान की आज्ञा अनुचार साधु असाधु की पहचान किये बिना ही साधु वेश भूषा को देख गुरु मान लेते है ।
माइक मोबाइल लेफटॉप प्रयोग में लेने वाले , लाइट पंखा कूलर एसी का प्रयोग करने वाले , वीडियो ग्राफी फ़ोटो का समर्थन करने वाले , निजी आश्रम - अस्पताल - स्कूल - स्थानक भवन - विहार धाम - आदि बनाने की प्रेरणा करने वाले , समाचार पत्रों का वांचन करने वाले , जनसंख्या बढ़ाना - समाधि स्थल बनाना - धन कोष बनाने की प्रेरणा करने वाले , साबुन सोडा प्रयोग में लेने वाले , भव्य चातुर्मास प्रवेश करने वाले , टिफिन गौचरी करने वाले , नाम के आगे पीछे डॉ - राष्ट्र संत जैसी कई तरह की अहंकारी पदवी लगाने वाले , ऋद्धि सिद्धि - सुख शांति धन वृद्धि हेतु जाप अनुष्ठान करवाने वाले , बैटरी साइकिल से विहार करने वाले आदि आदि कई साधु साध्वी , दोष वाला संयमी जीवन जी रहे है । ऐसे असाधुओ को जिनको प्रभु महावीर ने स्वीकार नही किया वो हमारे गुरु हो ही नही सकते । लेकिन ज्ञान के अभाव में कुछ लोग कहते है कि उन्हें कुछ नही कहना , वो हमारे से अच्छे है । लेकिन यह कैसे हो सकता है ? जो हमारे जिनेश्वर भगवान की आज्ञा का पालन ही नही करते हो , जगह जगह पर संयम में दोष लगाते हो , वो अच्छे और सच्चे गुरु कैसे हो सकते है । वो तो स्वंयं मलिन है उन्हें हम गुरु कैसे बोल सकते है ? ऐसे साधक अनमोल हीरे में तिराड के समान है जिनकी कीमत एक कोड़ी भी नही रहती है । इन्हें गुरु बोलना स्वंयं को अज्ञानी बोलने जैसा होगा ।
दोष युक्त संयमी जीवन जीना अथार्त अठारह पाप का सेवन करना होता है । अठारह पाप नाव में अठारह छिद्र के समान है । समझदारों के लिए इतना ही काफी है कि छिद्र वाली नाव ना कभी सागर में तीरी है और ना ही कभी तीर सकती और उसमें बैठने वाला भी तीर नही सकता ।
इसलिए ऐसी छिद्रों वाली नाव को छोड़ देना ही समझदारी और बुद्धिमता का कार्य है । सिर्फ साधु वेश पहनने से कोई साधक वंदनीय नही होता है । साधकता को पाने के लिए परमात्मा प्रभु की आज्ञा अनुचार आचार और विचार भी होना जरूरी है । सम्प्रदायवाद को छोड़ आगम प्रमाण से अच्छे और सच्चे गुरु की पहचान करे क्योकि इस अति दुर्लभ मनुष्य भव को सफल बनाने के लिए भी एक सच्चे गुरु की आवश्यकता होती है । जो स्वंयं भी इस भव सागर से तिरते है और दूसरों को भी तिरने का मार्ग बताते है । गुरु ही जीवन निर्माता होता है । गुरु ही जीवन का उजाला होते है । मन मे निश्चय करे की जो भगवान की आज्ञा में है वो ही मेरे गुरु है , वो ही मेरे गुरु है ।
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