हम कितने संकुचित हो गए है।

परिवार क्यों टूट रहे है!

--मीनाक्षी शर्मा(ग्वालियर)

परिवार वो हैं जहां हमे अपनापन महसूस हो जहां हम खुद को सुरक्षित महसूस करे .
बस साथ रहने से ही परिवार नही बनता
परिवार मतलब जो अपने सुख दुख एक दूसरे पर वार दे कुरबान कर दे वो है परिवार ।
किसी एक से नही परिवार तो उसमें रहने वाले सब लोगो से बनता है यही परिवार बाद में एक समाज बनाते है जिसका हम सब हिस्सा हैं।
यूँ तो कहने को हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे है जहां हमने तरक्की भी बहुत की है ..
आप किसी भी क्षेत्र में देख ले सब जगह महिलाओं और पुरुषों का अपना वर्चस्व हैं-रोज ही नई बुलंदियों को छू रहे है हम।
नित नए रास्ते खुल जाते है तरक्की के काम के  पर एक सवाल फिर भी है कि जितनी तरक्की हमने अपने काम में की है उतना ही हम अपने नैतिक मूल्यो से पिछड़ रहे हैं।

इन सब का असर आज ये है कि जो परिवार हैं वो छोटे होते जा रहे हैं बस मेरा की भावना ने दिलो में घर कर लिया है
हम ओर हमारा जैसे शब्द तो हम कहीं खोते जा रहे हैं ।

कभी परिवारों का भी अपना एक अस्तित्व हुआ करता था
15 20 लोगो का एक परिवार एक कुटुम्ब होता था जहां सब एक दूसरे से प्यार करते थे -एक दूसरे के लिए दिल से समर्पित होते थे।

किसी एक कि तकलीफ पूरे परिवार की तकलीफ होती थी
मिल जुल के किसी भी समस्या का समाधान निकल आता था
बच्चो का तो इतना हुजूम था कि घर एक मेला सा बन जाता था।
अपने घर पर ही मनोरंजन हो जाता था पर समय बदला और इस बदलते समय के साथ बहुत कुछ बदला अब संयुक्त परिवार बचे ही नही ,अब परिवार संकुचित होते जा रहे हैं।

परिवार जितने छोटे है उतने ही उनमें अशान्ति का भाव है
अब बस सब के दिल मे एक अहम की भावना रह गई है
बस मै ओर मेरा,आज की पीढ़ी में ओर पुरानी पीढ़ी के विचारों में बहुत अंतर है बहुत बदलाव है -आज के लोगों को अकेलापन ज्यादा भाता है कोई रोक टोक उन्हें पसंद नही ,मान सम्मान की भावना बची ही नही .....
यहां अकेले उन्हें भी दोष देना ठीक नही -नई ओर पुरानी पीढ़ी दोनों को बदलाव की जरूरत है ,किसी एक के बदलने से कुछ नही होगा ।
हमे मिल के इसके लिए प्रयास करना होगा
आप माने ना माने ओर मजा तो सब के साथ ही हैं
थोड़ा हम बदले थोड़ा वो बदले
तभी हम परिवार बना पाएंगे और साथ मे जी पाएँगे
ओर सच मानिए उसी दिन सही मायनों मै परिवार का अर्थ समझ पाएंगे।

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