- किस्मत कब खुल जाए यह कहना ज्योतिष के पथिक के लिए कठिन नही होता क्योकि वे वक्त के हर एक लम्हे की कीमत कों समझते है -वो एक लम्हा ही हमारे जीवन को बदल देता है लोग फर्श से अर्श ओर अर्श से फर्श पर आ जाते है जो लोग अभी तक अपने जीवन मे संघर्ष ही संघर्ष कर रहे है अर्थात जेठ की सी तपती धूप में चल रहे है अभी तक सावन की खुशियों को लाने वाली मस्त बहार नही आई तो उनका इस जीवन व किस्मत से मोह भंग सा हो जाता है उन्हें लगने लगता है कि उनका जीवन तो यू ही घिसते घिसते ही पूरा होना है।
2 .पर अचानक उनके जीवन मे चमत्कारी परिवर्तन हो जाता है वे ओर उनको जानने वाले लोग चकित से रह जाते है कि अचानक सब कुछ बदल गया -इतने सकारात्मक संयोग मिल गए औऱ जीवन सुख,समृद्धि वैभव से परिपूर्ण हो गया--कैसे?
3 .उस वक्त उनके जन्मांग चक्र की महादशा बदलती है अर्थात जीवन को उत्कर्ष पर लाने वाली महादशा का समय शुरू होता है अर्थात उस महादशा के ग्रह का जुड़ाव कही न कही नक्षत्रों की गणित से 2,6,10,11 से विशेष जुड़ता है और धन,विलास,समृद्धि के तमाम साधन स्वतः जुटते है अर्थात मन की इच्छाएं पूर्ण होने को आरंभ हो जाती है
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4.कई बार अंतर्दशा कमाल कर जाती है महादशा बहुत अनुकूल नही भी होती पर अंतर्दशा का स्वामी अगर धन,कर्म,स्टेटस व इच्छाओं के पूर्ण करने वाले भाव का प्रतिनिधि अपने नक्षत्र से कर रहा होता है तब उस अंतर्दशा अवधि तक का समय जातक के लिए अचानक किस्मत चमकाने वाला सा हो जाता है जैसे ही वो अंतर्दशा खत्म होती है फिर संघर्ष शुरू हो जाता है।
5.फल प्रदान करने में महादशा,अंतर्दशा,प्रत्यंतर,सूक्ष्म अंतर व प्राण अंतर की महत्ता होती है- इसमे सबसे कम समय प्राण अंतर का होता है जो सेकण्ड से लेकर कुछ मिनट तक की अवधि हो सकती है और सूक्ष्म अंतर में यह अवधि कुछ घण्टों की हो सकती है इस प्रकार प्रत्यंतर कुछ दिन का तो अंतर्दशा कुछ माह से लेकर वर्ष तक औऱ सबसे लंबा समय महादशा का जो कई वर्षों तक होता है-सबसे अधिक शुक्र की महादशा 20 वर्ष की होती है।
6. अब अगर किसी के जन्मांग चक्र में शुक्र अनुकूल है और उसके शुक्र की महादशा शुरू हो गई है तो महादशनाथ शुक्र होने की वजह से यह दशा उनके लिए विशेष अनुकूल रहेगी-अगर अंतर्दशाओं के स्वामी भी अनुकूल रहे तो फिर सोने में सुहागा अर्थात बल्ले- बल्ले अन्यथा मिश्रित फल मिलेंगे पर एकदम विपरीत तब भी नही मिलेंगे जब अंतर दशा प्रतिकूल हो क्योकि महादशा नाथ की अनुकूलता अंतर्दशा नाथ को बड़ा गेम महादशा के विपरीत खेलने की अनुमति प्रदान नही करेंगे। सूक्ष्म अंतर प्राण अंतर वाली दशाएं संक्षिप्त समय के उस काल खंड में परिणाम से हिट या फिट करती है।
दशाओं की गणित में आपकीं दीर्ध अवधि की किस्मत तब खुलती है जब महादशानाथ कुंडली का कारक ग्रह होता है उसकी स्थिति भाव, नक्षत्र के आधार पर शुभ होती है तब उस दशा को गोल्डन पीरियड अर्थात जीवन बनाने वाली दशा के रूप में जाना जाता है-- कुछ माह से लेकर कुछ वर्ष तक की तब खुलती है जब अंतर्दशा नाथ विशेष देने वाला ग्रह कुंडली मे बन कर आया होता है।सूक्ष्म व प्राण अंतर का समय तो जिसे कुछ पलों या घण्टों,दिनों की चांदनी जैसा होता है अर्थात इनका असली प्रभाव तो तब ही मिलता है जब महादशानाथ व अन्तर्दशानाथ भी अनुकूल हो या फिर अशुभता करने वाले न हो तब भी परिणाम मन को सुकून देने वाला होता है।अन्यथा जीत के बाद भी जीत व्यर्थ सी लगने लगती है
8. दशाओं की गणित में कुछ तकनीकी सूत्र महत्वपूर्ण है अर्थात लग्न राशि ,स्वामी ,ग्रहों की मित्रता या शत्रुता के आधार पर दशाएं अनुकूल व प्रतिकूल प्रभाव देती है जैसे वृषभ व तुला लग्न के जातकों के लिए सूर्य की दशा सुखद नही हो सकती यहां वृषभ लग्न में सूर्य की राशि चतुर्थ स्थान में आती है इसलिए माता,भूमि,वाहन तथा शिक्षा पर प्रभाव पड़ता ही पड़ता है।ठीक इसी प्रकार तुला लग्न के जातक में सूर्य एकादश स्थान अर्थात लाभ भाव तथा बड़े भाई बहन के स्थान का मालिक है इसलिए इस भाव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना ही है।इसके साथ सूर्य जिस भाव मे बैठा है तो वहां पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा औऱ सूक्ष्म गणित में सूर्य के नक्षत्र के समीकरण तक यह जोड़ जाएगी।
9. कुछ इसी प्रकार बाधक ग्रहों की गणित भी प्रभावी होती है जैसे चर लग्न मेष,कर्क, तुला,मकर के लिए 11 व बाधक होता है तो इस बाधक ग्रह की दशा अच्छे प्रभाव में होने के बाद भी कही न कही नकारात्मक प्रभाव देगी ही देगी। विशेष रूप से बाधक ग्रह की दशा में शरीर सुख प्रभावित होता है। स्थिर लग्न के लिए वृषभ,सिंह, वृश्चिक व कुम्भ यहां 9 व भाव बाधक माना गया है तथा द्विस्वभाव लग्न मिथुन,कन्या धनु, मीन में 7 भाव बाधक माना गया हैअर्थात यहां इस भाव के विपरीत परिणाम मिलते है।
10 . जन्म कुंडली मे मारक ग्रहों की भी अपनी क्षमता होती है 2 व 7 भाव को मारक कहते है और इनके स्वामी शरीर को प्रभावित करते है। 2 भाव धन तथा 7 वा भाव पत्नी,साझेदार,व्यापार व पिता का लाभ भाव को व्यक्त करता है।2 भाव जीवन साथी का 8 भाव होता है इसलिए इन भावों के कारकों पर इनके प्रभाव पड़ सकते है।अगर मारक ग्रहों की दशा चल रही हो तो भावों के कारक तत्वों के प्रभाव पड़ते है।
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