क्यो छूट रहे है दाम्पत्य बंधन- क्यो टूट रहे है परिवार
शादी की शहनाई, सजावट, तड़क भड़क,जश्न के माहौल की यादें ही ठंडी नहीं पड़ती उससे पहले यह खबर आ जाती है कि 2 माह पहले हम जिस शादी में गए थे वो रिश्ता टूट रहा है अर्थात तलाक हो रहा है।
पढ़े लिखे,समझदार बच्चे जो दोनों कमा रहे है--एक दूजे को समझ कर शादी की है--माता पिता अर्थात परिवार की और से थोपा गया रिश्ता नही है--स्वयं दो दिलों की आपसी समझ का रिश्ता है-- शादी के बंधन में बंधने से पहले एक दूजे को पसंद दिल से किया है- साथ साथ आते जाते रहे है अर्थात साथ घूमना,साथ खाना पीना,एक दूजे को इतना करीब से जानने के बाद शादी का फैसला---माँ- बाप अर्थात परिवार भी आजकल यह सोचने लगे है कि अगर बच्चे अपने जीवन साथी का चयन खुद कर रहे है तो कर लेने दीजिये क्योकि जीवन तो इनको ही एक दूजे के साथ बिताना है इसलिए आजकल माँ - बाप भी अपने बच्चों की खुशी के लिए उनके निर्णय पर अपनी मुहर बिना किसी ना- नुकुर के लगा देते है।
अब यहां दहेज- लेन-देन की कुरुति भी सामने नहीं आती पर जब कुछ ही दिनों- महीनों में यह खबर आती है कि रिश्ता छूट रहा है- एक नया परिवार टूट रहा है तब सवाल खड़े होते है कि आखिर क्यों टूट रहे है दांपत्य बंधन?
आखिर ऐसा क्या हो गया कि दोनों पढ़े लिखे सुशिक्षित ,अच्छी कमाई करने वाले युवा जो एक दूजे को भली भांति जान कर जीवन साथी बने थे अब अलग ही होना क्यों चाहते है?
अनबन पैसे के अभाव में तो कई प्रकार की हो सकती है पर जब दोनों अच्छा कमा रहे है तब बात पैसे की नहीं रही--तब फिर क्या हो सकता अहम और यह ईगो ही मन की गाड़ी पर प्रहार करता है फिर जीवन की गाड़ी लड़खड़ाने लग जाती है।
अब सवाल यह है कि यह होता क्यो है? जब दोनों ने प्यार करके,एक दूजे को समझ कर शादी की है फिर क्यो टकराते है मन! एक दूजे पर जिम्मेदारी थोपने की और कोई बात या कोई काम समय पर न होने से जो तकरार होती है उसमें फिर दोनों की डिग्री,दोनों की कमाई का फिगर इस क्लेश का एक दूजे को समझने,सुनने तक की सहनशीलता खत्म हो गई है-एक दूजे को मनाने,सॉरी कहने में खुद को छोटा महसूस करने लगे है-- तभी सेे पहले दिल रूठने लगे है फिर घर टूटने लगे है।
सबसे गंभीर बात यह है कि यहां निर्णय 2 मिनट में ये दो दिल कर लेते है और वकील तक तलाक के लिए इनके कागजात पहुंच जाते है।यहां परिवार,समाज,बड़े बुजुर्गों की भूमिका की कोई संभावना नही रहती जो कि अक्सर बड़े बुजुर्गों के दुआरा किये रिश्तों में रहती है ।
-वहां परिवार के दोनों पक्ष मिल बैठ कर अशांति,मन के क्लेश को मिटाने की कोशिश करते है और कभी कभी समाज के प्रमुख मौजिज लोगों को भी जटिल स्थिति में बुलाते है अर्थात सामाजिक इन कोशिशों से तलाक तक बात ही नही जाती--दोनों पक्षों को समझाकर समस्या का निदान कर लिया जाता।
पर ये बाते तो अब पुरानी हो गई न-- अब दुनियां नजरों के नजारों की दीवानी हो गई इसलिए एक पल में दिल जुड़ते है और लम्हों में टूट भी जाते है।
इन रिश्तों के बनने- बिगड़ने का दर्द इन दो दिलों के साथ इनके परिवारों को कितना चुकाना पड़ता है उस दर्द की कोई कल्पना करें जब माँ - बाप इस वजह से अपने मेघावी बच्चो को डिप्रेशन में जाता हुआ देखते है और कई बार तो बच्चे फिर दिल के इस सूनेपन को सहन ही नहीं कर पाते और जिंदगी को अलविदा कह देते है।
सहनशीलता औऱ समझ की यह कमी कम उम्र की नादानी बन कर परिवार और समाजों पर कितना घातक प्रभाव डाल रही है शायद तभी पुरातन संस्कृति और उसके संस्कारो की अब इस आधुनिक दौर में भी जरूरत महसूस हो रही है।
- संजय सनम
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