गुरु पूर्णिमा की गरिमा कही खतरे में तो नही!

गुरु पूर्णिमा विशेष--गुरु किसे कहते  है?



हमारी भारतीय संस्कृति कृषि प्रधान व ऋषि प्रधान संस्कृति रही है इसलिए साधु,संतों व गुरुओं के प्रति हमारी श्रद्धा की पराकाष्ठा बड़ी उच्च रही है।

हमारी इस संस्कृति में जब गुरु राज दरबार मे आते तो राजा अपना सिंहासन छोड़ कर गुरु के चरणों मे बैठ  जाया करते थे।

वो दौर अलग था-त्यागी,तपस्वी ऋषियों का दौर था जब सत्ता उनके सामने नत मस्तक रहती थी फिर भी संत,आचार्य,गुरु राज्य के सुनसान जंगली क्षेत्र में अपनी कुटिया बना कर त्याग,तपस्या साधना किया करते थे।

अगर उस दौर की आध्यात्मिक संतो की आज के दौर से तुलना करें तो पूर्णिमा में अमावस की सघन छांव सी दिखने लगती है ।

आस्था  आज भी जिंदा है पर आध्यात्मिक पथिकों का सतत्व कही खो गया लगता है कुछ अपवादों को अगर छोड़ दिया जाए तो आज की आध्यात्मिक संस्कृति सियासत का अखाड़ा बन गयी है तो कही भोग विलास का रूपक भी बन गयी है।
कुछ जो सच्चे और पक्के आध्यात्मिक पथिक है वे भोगी,पाखंडियों की नजरों में चुभ रहे है।

जब दाल में काला हो और जब दाल ही काली हो तब इस अंतर में गुरु की खोज ही  बड़ी पेचीदा हो जाती है।
वैसे गुरु अगर आध्यात्मिक जगत के हो तो उन पर तो जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है क्योकि आत्मकल्याण करते हुए जन कल्याण करना और अपने अनुयायियों को उचित मार्गदर्शन देना गुरु का दायित्व होता है।

गुरु में न तो राग हो सकता है न ही द्वेष --गुरु में सिर्फ ज्ञान,ध्यान,ही रहता अशेष।
गुरु वो है जिनके सामने जाने मात्र से सवाल समाधित हो जाये।
पर आजकल के गुरु सवालों के सामने मोन रहते है क्योकि उनके पास जवाब होता नही है।

जिनके पास जिज्ञासाओं का समाधान नही हो अर्थात वो ज्ञान नही हो वे हमारे गुरु फिर कैसे हो सकते है?

गुरु का सीधा सरल अर्थ मास्टरी अर्थात विशेषज्ञता है वो किसी भी क्षेत्र की हो सकती है--हमारे भी अलग अलग क्षेत्र के अलग अलग गुरु होते है जो हमे सिखाते है और जीवन निर्माण में जो अपनी भूमिका निभाते है।
सवाल यह है कि कही हम गुरु पूर्णिमा की रस्म तो ही नही निभा रहे --हमारे सवाल मोन की भाषा से कही निरुत्तर तो नही रह रहे?
कही विसंगतियों के जमावड़े को हमारे तथाकथित गुरु पोषक बन कर पोषण तो नही कर रहे?
अगर ऐसा है तब वे आपके सच्चे गुरु नही बस रस्मी गुरु है और आप उनके साथ दिखावे के लिए गुरु पूर्णिमा की रस्म भर ही निभा रहे है।

सच्चे संत,गुरु के सामीप्य में जाने मात्र से मन को सुकून मिल जाएगा क्योकि उनके आभामंडल में कही छल कपट नही रहता,कही वैर - विरोध नही रहता।
वे किसी को उठाने और किसी को गिराने की  सियासत में लिप्त नहीं होते इसलिए उनके आभामंडल से सकारात्मक किरणे हमारे मन को सुकून देती है पर जहां गुरु के वेष में छद्म राजनीति  की उठापटक हो--दौलत के आंकड़ों का हिसाब हो- पक्षपात पूर्ण जिनकी भावना हो वे रस्मी गुरु तो हो सकते है पर रश्मि गुरु नही हो सकते।

गुरु पूर्णिमा को यह फैसला जरूर कीजिये कि रस्मी के पास जा रहे है या जाना पड़ रहा है या फिर सौभाग्य से रश्मि युक्त गुरु आपको  मिले है!
गुरु पूर्णिमा की गरिमा कही न कही छद्मवेशी,पाखंडियों की वजह से खतरे में है।
सच्चे संतो को यह सम्मान मिलना चाहिए क्योकि इसके असली हकदार वे ही है।

- संजय सनम
संपादक- फर्स्ट न्यूज़
16/07/2019


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