ग्रहण- धर्म- विज्ञान--अब कुरूतियों को कीजिये बाय- बाय

हमारी प्राचीन मान्यताओं के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक तर्क ही आधार हुआ करता था और वे सभी मान्यताएं अपने अपने उन दौरों के लिए उचित भी थी पर आज के इस डिजिटल दौर में हम उन मान्यताओं को बेवजह ले कर चल रहे है जबकि इस दौर में उनका कोई अर्थ ही नही है। क्योकि दौर बदलने व वातावरण में बदलाव होने से उन मान्यताओं की अब कोई तार्किक आवश्यकता ही नही रहती।इन्ही कुछ मान्यताओं पर तार्किक विश्लेषण का एक आलेख बबिता अग्रवाल कंवल की कलम से आप तक पहुंचा रहे है।

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आज हम 21वी सदी कि और कदम रखने जा रहे है, फिर भी दकियानूसी बातों को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ते.... आइये सबसे पहले जानते है कि ग्रहण कैसे होता है!
सुर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण एक सामान्य प्रक्रिया हैं ... हमारी सनातन संस्कृति ने वैज्ञानिक कारणों से ग्रहण के अवसर पर विशेष सावधानी का प्रावधान किया था -पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए सूर्य का चक्कर लगाती है। और चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। ब्रह्मांड के ये तीनों ग्रह अपनी-अपनी कक्षाओं में घूमते हुए जब एक सीध में आ जाते हैं, तब सूर्य या चंद्रग्रहण लगता है।


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ग्रहण के दौरान चन्द्र व सूर्य से कुछ ऐसी किरणें उत्सर्जित होती हैं जिनके सम्पर्क में आ जाने से हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और यदि ना चाहते हुए भी इन किरणों से सम्पर्क हो जाए तो स्नान करके इनके दुष्प्रभाव को समाप्त कर देना चाहिए। इन्हीं किरणों से भोजन भी दूषित हो जाता है।

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और उस समय कच्चे घर या फिर खुले आसमां के नीचें ही खाद्य सामग्री रखीं जाती थी तथा बाहर खुले में इंसान की सभी दिनचर्या हुआ करतीं थी, जिसकी वजह से सावधानी बरतना बहुत जरुरी होता था।
मन्दिरों के पट बन्द करने के पीछे भी मुख्य उद्देश्य यही था क्योंकि जनमानस में नियमित मन्दिर जाने को लेकर एक प्रकार का नियम व श्रद्धा का भाव होता था। अतः जिन श्रद्धालुओं का नियमित मन्दिर जाने का नियम था उन्हें ग्रहण के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए मन्दिरों के पट बंद कर दिए जाते थे।
परंतु आज का युग ऐसा नहीं हैं सोचने वाली बात ये हैं की ,फिर क्यों हम ऐसी दकियानूसी बातों का बोझा ढोकर चल रहें हैं। कारण... हमारे पुर्वजों का धर्म के ठेकेदारों पर अंधविश्वास.... जिसका ख़ामियाज़ा हम भुगत तो रहें हैं परंतु सुधार नहीं कर रहें हैं। धर्म के ठेकेदारों ने हिंदू धर्म का हौवा बनाकर रख दिया हैं और हम सभ्य, शिक्षित होते हुए भी इन सबके भागीदार बन रहें हैं।
आइए अब समय आ गया हैं, एक बदलाव का, सनातन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का रूख अपनाने का और हिंदू धर्म और समाज को धर्म के ठेकेदारों के पाखंड से बचाकर अपने धर्म को हौवा बनाने से रोकने का! हम प्रण करें कि हमारे पूर्वजों द्वारा कि गई गलतियों को यहीं विराम लगाकर, हिंदू धर्म को सभ्य, सुसंस्कृत बनाएं ताकि आनेवाली पिढ़ी गर्व से कह सकें कि हिन्दू धर्म दकियानूसी रिवाजों का अनुसरण नहीं करता हैं, और न ही करेगा...।अब वक्त है धर्म की आड़ में चल रही कुरूतियों को बाय- बाय कहने का---आशा है आप भी इस मिशन के सहयोगी बनेंगे।

स्रोत- बबिता अग्रवाल कंवल


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