जैन समाज की शिल्पा फातिमा बनी
गुंटूर में जैन समाज की शिल्पा जैन ने मुस्लिम युवक से शादी करके मुस्लिम धर्म अपना लिया है अब उनका नया नाम फातिमा हो गया है।
सोशल मीडिया में धर्म परिवर्तन की यह खबर जैन समाज के ग्रुप् में कुछ सवालों के साथ थी- शिल्पा उर्फ फातिमा के पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी और उनके देहांत के बाद परिवार बड़ी विकट परिस्थिति में आ गया था पर जैन समाज ने इस परिवार की सुध नही ली वही एक मुस्लिम परिवार ने कठिन परिस्थिति में इस परिवार की मदद की और बढ़ती हुई निकटता शिल्पा को अब फातिमा बना गई।
सवाल भी मार्मिक थे कि हम लोग मंदिरों में करोड़ो का खर्च कर देते है-अपने ही घरों के उत्सवों में करोड़ो खर्च कर देते है पर अपने ही समाज के कमजोर परिवारों को हम आर्थिक सहारा नही देते और वो आर्थिक मजबूरियां किसी परिवार को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर कर देती है-गंटूर की शिल्पा जो अब फातिमा बन गई है वो सम्पूर्ण जैन समाज की उस समृद्धि से सवाल पूछ रहा है कि किस काम की तुम्हारी यह समृद्धि जो एक बेटी को मजबूरी से धर्म परिवर्तन के लिए नही बचा पाया।
सबसे अधिक करदाता होने का श्रेय रखने वाले जैन समाज पर ऐसे सवाल पहले भी पूछे गए है क्योकि जैन समाज की लड़कियां मुस्लिम पहले भी बनी है।
धर्म की मान्यता हर व्यक्ति का अपना अधिकार है वो अपनी इच्छा से किसी धर्म को छोड़ सकता है और किसी धर्म को अपना सकता है पर अगर मुश्किल दौर में किसी के दुआरा किये उपकारों के लिए उसे अपना धर्म बदलना पड़े तो यह विचारणीय प्रश्न है।
बनवासी क्षेत्रों में दौलत के जोर पर मजबूरियों के दोहन से धर्म परिवर्तन की बड़ी दास्तानें आप ने भी सुनी होगी--एक हाथ से आप किसी को रोटी देते है तथा दूसरे हाथ से उस रोटी के बदले उसका धर्म छीन लेते है और अपने धर्म की पुस्तकें,ग्रन्थ पकड़वा देते है तब यह सेवा की आड़ में उस व्यक्ति की संस्कृति व संस्कारो के साथ बलात्कार होता है।
धर्म की निम्न स्तर की मार्केटिंग उन कमजोर,लाचार निस्सहाय परिवारों का ही शिकार करती है और खुद को फरिश्ता बनाकर पेश करती है-हालातो से मारे वे लोग,परिवार जब अपने समाज,अपने धर्म की जमीन से राहत नही पाते तब मजबूर होकर उनको अन्य लोगों की सहायता को परिवार के भरण पोषण के लिए लेना पड़ता है और गिव एंड टेक पालिसी के अंतर्गत अपना धर्म ईमान संस्कृति संस्कार और बेटियां तक देनी पड़ती है।
धर्म की मार्केटिंग का यह क्रूरतम सत्य वे मौजिज लोग अच्छे से समझते है कि उनके समाज से कोई बेटी धर्म परिवर्तन कर रही है पर उनके अपने नाम की भूख समाज की बेटी को धर्म परिवर्तन में बचाने से नही मिटती वो तो स्टेज अर्थात मंचो पर बैठने ,वहां अनुदान देने की घोषणा करने तथा सुबह के अखबारों में उस पेड़ खबर व फ़ोटो के प्रकाशित होने से बचती है। तब उस समाज की बेटियां कैसे बच सकती है जिस समाज के लक्ष्मी पुत्र अपनी लक्ष्मी का हिसाब अपने नाम के डंका बजाने के लिए गिन गिन कर करते है।
यह भी सच है कि समाज मे कुछ ऐसे लोग व संस्थाए भी जरूर है जो निस्वार्थ अपना दायित्व पूरा कर रही है पर उनकी अपनी सीमा है वे चाह कर भी बहुत दूर तक नही पहुंच पाती क्योकि आधुनिक भामाशाह अनुदान वही देते है जहाँ दी हुई रकम के हिसाब से उनका नाम,सम्मान, व मीडिया में चर्चा पूरी हो अन्यथा फिर दूसरी बार वे उस संस्था में अनुदान ही नही देते।
जब जब समाज ने सरस्वती पुत्रो को किनारे किया है तब तब ऐसे परिणाम आये है-क्योकि सरस्वती पुत्र अपनी लेखनी से समाज को जगा सकते है तथा समाचार के रूप में स्थिति को दूर -दूर तक पहुंचा कर आवश्यक सहायता के लिए प्रेरक बन सकते है-
इन घटनाओं के बाद अधिकतर इन लड़कियों के हालात क्या होते है वे इन सबको पहले इस रूप में विवेचित कर देते ताकि कोई भी लड़की इस जीवन मे आगे बढ़ने से पहले 100 बार सोच ले।
मैं यह नही कहता कि सारी घटनाएं ही फांसने की होती है कुछ अपवाद स्वरूप ठीक भी हो सकती है पर अधिकांशतः इनका परिणाम अत्यंत दुःखद अतीत के उदाहरण बताते है।
एक वयस्क लड़के अथवा लड़की का यह अधिकार है कि वो किससे शादी करे या किस धर्म को माने-हम उसमे किसी भी तरह का हस्तक्षेप नही कर सकते पर शर्त यही है कि उसके सामने इसके लिए कोई उपकार की रसीद न खड़ी हो कि उसको चुकाने के लिए वो अपना धर्म छोड़ दे और दूसरा धर्म ग्रहण कर ले--
अगर परिस्थिति की वजह से हो रहा है तो गलत है और यहां समाज की भूमिका बनती है पर लगता है जैन समाज इन दिनों आडंबरों की चकाचोंध में कुछ अधिक खो गया है इन दिनों नाम के पत्थर लगाने की होड़ अधिक लग रही है और इसके लिए कुछ अपवादों को छोड़कर कही न कही आध्यात्मिक पथिक भी सही दिशा निर्देश देने में असफल लग रहे है क्योकि वे भी मंदिरों में, सभा संस्थाओ ,ट्रस्ट में व्यस्त है और अधिकांश उदाहरण तो यह कड़वा सच कहते है कि गरीब,लाचार,कमजोर पर उनका ध्यान नही जाता वे भी लक्ष्मी पुत्रो की वरदावली गाने में लगे रहते है।
जो संत पक्के है वे चाह कर भी किसी का कल्याण उस रूप में नही कर सकते क्योकि दौलत वाले अपनी दौलत वही उड़ेलते है जहां उनका गुणगान होता है।
इसलिए समाज की किसी बेटी का किसी दूसरे धर्म मे जाना अगर आर्थिक मजबूरी से होता है तो फिर उस समाज को धिक्कार है और अगर वो अपनी मन इच्छा व किसी के वास्तविक प्यार से जाती है तो वो उसका संवैधानिक अधिकार है इस पर हम समाज को नही कोस सकते पर मजबूरी के मामले में समाज को छोड़ नही सकते।
संजय सनम
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