प्रतिष्ठा की लड़ाई जब व्यक्तिगत हो जाती है तब तकरार भी तू तू में में की होते होते सार्वजनिक हो जाती है।
क्या वैचारिक अस्वीकृति को अदालत के दरवाजे तक लाया जाना चाहिए?
क्या विसंगतियों के विरोध पर शाब्दिक मर्यादा व अभिव्यक्ति की गरिमा को छोड़ देना चाहिए?
क्या समाजों की जाजम इतनी कमजोर हो गई है कि वहां आपस मे सुलह की कोशिश तक हमे गवारा नही होती?
क्या श्रद्धा आस्था के नाम पर विसंगतियों को पालने फूलने देना चाहिए?
सवाल जबाब चाहते है पर अदालतों की तकरीर से नही बल्कि आपस मे बैठ कर एक दूजे को कहते सुनते देख कर।
क्या वैचारिक अस्वीकृति को अदालत के दरवाजे तक लाया जाना चाहिए?
क्या विसंगतियों के विरोध पर शाब्दिक मर्यादा व अभिव्यक्ति की गरिमा को छोड़ देना चाहिए?
क्या समाजों की जाजम इतनी कमजोर हो गई है कि वहां आपस मे सुलह की कोशिश तक हमे गवारा नही होती?
क्या श्रद्धा आस्था के नाम पर विसंगतियों को पालने फूलने देना चाहिए?
सवाल जबाब चाहते है पर अदालतों की तकरीर से नही बल्कि आपस मे बैठ कर एक दूजे को कहते सुनते देख कर।
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