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ME TOO...

ME TOO..शिकायत या षड्यंत्र।

जब चोट लगे तब ईलाज के लिए जाना पड़ता है -कभी कभी कुछ विलंब हो जाता है पर चोट वर्षों तक पड़ी नही रहती।
चोट चाहे जिस्म की हो या मन की—हर चोट,हर जख्म समय पर अपना ईलाज मांगता है।
Me Too… के नाम से जो दास्तानें एक या दो दशकों के बाद की जिस तरह से निकल कर आ रही है वो चोट के जख्मों की खुद हंसी उड़ाती है–उनकी यह क्रिया खुद सवाल करती है?
अब पता चला कि वो स्पर्श गलत तरीके से हुआ था–पर यह भी बता देते कि उस स्पर्श के बाद का लाभ कितना था?
उस स्पर्श पर फिर आपका जोशीला साथ कितना था? तब वो स्पर्श आत्मिक, आर्थिक सूखकर क्यों लगा? और अब 15-20  वर्ष बाद वो स्पर्श याद कैसे आया?
अब वो स्पर्श दुःख कैसे देने लगा? 
हो सकता है कि कुछ स्पर्श मजबूरी से उस वक्त स्वीकार किये गए पर उनकी शिकायत उन दिनों क्यो नही हुई?
 और अब वो स्पर्श अचानक दर्द देने लगे!
शायद इन स्पर्शो की बयानगी की कीमत बोल रही है–जिस अंदाज में  me too का यह कंपेन चल रहा है यह शिकायत नही षड्यंत्र लग रहा है।
जिनकी शिकायत है क्या उन्होंने कभी स्पर्श अपने पुरुष मित्रों के साथ नही किया?
अगर वे इतनी पाक है तो फिर उस वक्त कोई मजबूरी उन्हें रोक नही सकती थी—इस तरह की बयानबाजी कही स्पर्श को बुलावा तो नही है?
यह कंपेन विश्वास के साथ छलावा है-  दोस्ती के आत्मिय रिश्तें पर भी लोग अब बिंदास अंदाज में अपने मन की बात कहने से परहेज करेंगे!
जो इस कंपेन का हिस्सा बनी है उन्होंने भारतीय संस्कृति की महिलाओं का निरादर किया है।हमारी नारी शक्ति किसी  गलत स्पर्श का जबाब देने में 15-20 वर्ष की प्रतीक्षा नही करती वो सीधे हाथ से  तुरंत जबाब देती है और स्पर्शमय हो जाती है तब ब्लेक मेल के रूप में उसकी कीमत नही लेती।
जिस्म के रिश्तों का ज़मीर के साथ सौदा सा लगता है यह कंपेन।
इसमे राजनीतिक साजिश की बू भी लोग बता रहे है जो गलत नही लगती।
एक बार के लिए मन मष्तिष्क यह सोचने के लिए विवश जरूर हुआ था कि  अब आत्मियता के साथ बिंदास अंदाज में अपने खास मित्रों को भी कुछ कहने,लिखने से पहले सोचना पड़ेगा—-पर नही—
कुछ साजिशें  हमारे यकीन को नही मिटा सकती
 असली भारतीय नारी कभी दिल का दगा नही दे सकती।
हमारा यकीन हमारे मित्रों से बरकरार है बिना किसी me   too  के खतरे के।
जिन्होंने यह तब का अब किया है उनके दर्द पर अब मरहम नही लग सकता—क्योंकि इतने पुराने नासुरो पर मरहम काम भी नही करता।
अहसासों का व्यापार न कीजिये—विश्वास को सियासत के बाजार में खड़ा मत कीजिये।
कुछ लोग ईश्वर को नही मानते यह उनका अपना सिद्धांत है हम इसका भी सम्मान करते है पर कुछ लोग विश्वास के उस अहसास को भी नही मानते—-यह गुनाह है और इसका प्रत्यक्ष,अप्रत्यक्ष समर्थन नही किया जा सकता।
इस me too की नकली कंपेन असली कंप्लेन को भी दरकिनार न कर दे—जिसके साथ वास्तव में अन्याय हुआ हो उसे न्याय दिलाने में बाधक न बन जाये।
संजय सनम
संपादक-  फर्स्ट न्यूज़
72780-27381
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