रिश्तो के ये औपचारिक डे-----?

ये दिवसों का प्रचलन रिश्तों को याद दिलाने का अगर कोई बहाना है तो यह औपचारिकता भी बेजा नहीं लगती---

हर रिश्ता अनमोल है--अगर समझने वाले के मन में उस रिश्ते के होने और उसमे खोने का मोल है--

अन्यथा रिश्तो में भी दर्द की टीस होती है-पीड़ होती है--
रिश्तों की आड़ में ज़ख्मो  की भेंट होती है--

इसलिए रिश्ता चाहे पारिवारिक हो,सामाजिक हो,जब तक वो दिल  से जुड़ा नहीं होता---अपनत्व के भाव से बंधा नहीं होता तब तक कोई भी रिश्ता वफ़ा का हिस्सा नहीं बन सकता।

हर रिश्ते में एक अहसास होता है- एक दूजे के लिए अलहदा कुछ खास भाव होता है--वो रिश्ता चाहे खून का नहीं भी होता फिर भी खून से बढ़कर हो जाता है
और जब रिश्ता स्वार्थ में पला होता है तब वो खून का भी होकर उसकी मर्यादा के मोल का खून कर जाता है।

माँ का रिश्ता सबसे अहम है क्योंकि दुनियां में लाने व् ममत्व की छाँव में पालने का कारक है--तब उस माँ के कदमो को स्वर्ग का धाम तक कहा जाता है--पर दुनियां की हर माँ ईमानदार नहीं होती--गर होती तो भ्रूण हत्या नहीं हुई होती---बच्चे को छोड़कर प्रेमी के साथ न भागी होती--और दौलत के लिए अपने बच्चो को न त्यागी होती।

ठीक इसी तरह संसार का हर रिश्ता खास है पर उस रिश्ते को समझने वाला साथ मिले यह अपनी तकदीर की बात है।

टिप्पणियाँ

VASUNDHARA ने कहा…
आज रिश्ते को समझना पड़ता है पहले इतने कठिन रिश्ते नहीं थे। बाज़ार ने रिश्तों को भी अपनी कैद में ले लिया है। आपने बहुत अच्छा लिखा है।