राजस्थान के बस सफर में सहयात्री एक प्राध्यापिका से आपसी परिचय के बाद उनकी बेटी की कहानी जब सुनी तब यह सोचने के लिए मजबूर हो गया कि इस आरक्षण ने न जाने कितनी काबलियत को अवसाद की सजा दी है---न जाने कितने सपनों का खून किया--न जाने कितने युवाओं ने अपनी तकदीर को इस लिए कोसा कि वे जनरल कास्ट में पैदा क्यों हुए?
काश पिछड़ी जाति में होते तो शिक्षा का खर्च भी नहीं लगता और न ही मेहनत की भी उतनी आवश्यकता होती क्योकि कम प्राप्ताकं में भी चयन हो जाता है आखिर सबसे बड़ी योग्यता जनरल कास्ट से न होनी होती है।
बहुत अच्छे प्राप्तांक लाने वाली एक बेटी जब चयन प्रक्रिया में नहीं आ पाती और उससे प्राप्तांक में बहुत दूर रहने वाली का जब चयन हो जाता है तब वो बेटी अपनी माँ से कहती है कि आपने काश पिछड़ी जाती से अपना हमसफ़र चुन लिया होता तो आज मेरा भी चयन हो गया होता।
वो माँ अपनी बेटी के इस सवाल पर स्तब्ध रह गई---गुस्सा भी आया और बेटी के दर्द पर आंसू भी आये--।
प्रतिभाओं के साथ सियासत का यह खुला मज़ाक है और देश के साथ अप्रत्यक्ष रूप से खिलवाड़--
कास्ट के नाम पर किसी भी तरह का भेदभाव उचित नहीं है---चाहे वो सम्मान के नाम पर हो या आरक्षण के नाम पर-----
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