यह क्या मजाक है?

गायक कलाकार सोनू निगम ने मंदिर,मस्जिद, गिरजा,गुरुद्वारों में लाउड स्पीकर के प्रयोग पर अपनी बात क्या कह दी कि तूफान सा आ गया।
अगर उन्होंने बात सिर्फ अज़ान के लिए ही कही होती तब इस पर प्रतिक्रिया उचित थी पर उन्होंने तो सभी धर्मों में लाउड स्पीकर के जब चाहे तब प्रयोग पर अगर कोई बात कही है तब इसे धर्म विरोधी कहना कितना तर्क संगत है?
वैचारिक अभिव्यक्ति की आज़ादी क्या इसे ही कहते है कि कोई निष्पक्ष अपने विचार भी नहीं रख सकता।
इस देश को फतवों का देश क्यों बनाया जा रहा है?
जब जिसने चाहा फ़तवा दे दिया---

सोनू निगम के तर्क को समझने की कोशिश तक नहीं की गई बस मजहब विरोधी बताकर सर मुंडन करवा कर और भद्दी से भद्दी  अर्थात लोकल ब्रांड के जुते लटकाकर सभी धर्मों के अनुयायियों के घरों में घुमाने पर 10 लाख का ईनाम देने की घोषणा भी हो गई।

इस चुनोती को स्वीकार कर सोनू ने सर का मुंडन भी करवा लिया और मौलवी साहिब से 10 लाख की मांग भी रख दी पर मौलवी साहिब ने कहा कि अभी 2 बात और बाकी है वो पूरी की जाये।

कुल मिलाकर एक विचार को धर्म और राजनीति की नोटंकी में बदलना यहां सबसे अधिक आसान है।

सोनू ने कहा कि उस दौर में जब मज़हब का स्वरूप बना तब उस वक्त लाउड स्पीकर तो नहीं थे--इसलिए  माइक का उपयोग मज़हबी संस्कृति की अनिवार्यता नहीं कहा जा सकता।

अब बताइये इसमें मज़हब विरोध कहां है?

अगर माइक प्रयोग के उस वक्त के तथ्य है तो बताये जा
सकते है--विरोध और फतवे के प्रयोग की क्या बात है?

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