कल एक जैन आचार्य श्री सूरी जी महाराज का प्रवचन सुन रहा था---बहुत सारगर्भित रूप से जीवन को सुखद बनाने के लिए मन की भूमिका, व् सक्रिय सकारात्मक सोच की महत्ता व् सबसे बड़ी बात अतीत की दर्द भरी यादों को याद न रखने की सलाह अर्थात उन तमाम फाइल को डिलीट करने की उपयोगिता का मार्मिक सन्देश था।
अतीत के उन दर्द भरे लम्हो का बोझा हम अपने वर्तमान में भी ढोते रहते है और जिसकी वजह से वर्तमान भी बोझिल और घुटन की अनुभूति की वज़ह बन जाता है इसलिए जिस तरह से कंप्यूटर की मैमोरी में हम सिर्फ काम आने वाली फाइल रखते है--बेकार की फाइल को डिलीट मार देते है ताकि कंप्यूटर में स्पेस भी मिलता है और बेकार के अनुपयोगी सामग्री की भीड़ में उपयोगी सामग्री भी गुम नहीं होती कुछ इसी तरह दिमाग , दिल की मैमोरी में दर्द,विषाद,कटुता,द्वेष की फाइल को नहीं रखना चाहिए उन्हें तुरंत डिलिट करे व् उनकी जगह प्यार,सद्भावना,विश्वास,सहयोग की फाइल को सेव करे।
क्योकि दर्द,विषाद की फाइल कटुता,ईर्ष्या के भाव लायेगी और हमारी ऊर्जा के प्रवाह को उधर ले जाएगी जिससे हमें मानसिक व्यथा होगी और लक्ष्य से भी ध्यान हटेगा फलस्वरूप परिणाम भी प्रतिकूल आएगा इसलिए दर्द के पन्नो की किताब दिल और दिमाग में मत रखिये।
किसी का दिया हुआ विश्वास, किसी के दिल का प्यार भरा अहसास जो आपकी शक्ति,ऊर्जा का कार्य करता है उसे अपनी महत्वपूर्ण फाइल में रखिये।
बात साफ है कि कचरे को कही पर भी रखना अच्छा नहीं होता और बात अगर दिल और दिमाग पर हो तब तो बिलकुल भी इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती।
अगर हमको अपनी कार्य क्षमता बढ़ानी है तो मानसिक क्षमता बढ़ानी होगी और उसके लिए दिल दिमाग को हल्का रखना होगा--किसी भी तरह की नकारात्मकता का वायरस नहीं आ पाए इसके लिए सचेत रहना होगा।
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