सामाजिक मंच और बिगड़ैल सियासत

सियासत के क्षेत्र में तो कूटनीति को भी जायज़ कहा जा सकता है पर सामाजिक और आध्यात्मिक मंचों पर सियासत भी स्वीकार्य नहीं की जा सकती।
सियासत का साम,दाम,दंड,भेद के साथ चलने का जब यह नज़ारा सामाजिक मंच पर और आध्यात्मिक संस्कृति में दिखता है तब आम जन मानस के मन में आक्रोश की चिंगारी का जन्म होता है।
समाज की सेवा के नाम पर धन बल और बाहु बल से नैतिकता के उसूलों को जब जब भी तोडा जाता है तब असली टूट उस समाज की दीवारों में भी होती है।
अंध भक्ति और श्रद्धा के नाम पर जब जब आम जन मानस के मन के सवालो को उनकी जुबान पर आने से रोका जाता है तब भीतर ही भीतर भावनाओं के दरकने से प्रलयंकारी भूकंप की सृष्टि होती है।
सामाजिक मंचों पर जब भी रुतबे की दादागिरी का खेल दिखता है तब समाज के लिए वो विघटन की ताकतों के विस्तार का रूपक सा लगता है।
कड़वा सच तो यह है कि अब सियासत के मैदान की उस सियासत से भी गिरी हुई सियासत सामाजिक मंचों पर होने लगी है---और सामाजिक ताने बाने को जोड़े रखने वाले उन सिद्धान्तों की धज्जियां उड़ने लगी है।
कुछ लोग जो समाजो के लिए आदर्श होते है--निस्वार्थ भावना से आते है --ये लोग अपवाद होते है पर अक्सर इन लोगों को भी वे तथाकथित लोग पीछे धकेल देते है और कभी कभी तो उन सज्जन के किये कार्य को बड़ी कुशलता से अपने नाम भी कर लेते है।
अखबारों में अक्सर आने वाली तस्वीरे ये दौलत के दम पर आती है---छपास की यह चाहत इतनी नीचे गिरा देती है कि कुछ लोग कॉर्पोरेट दलाल की भूमिका में आ जाते है और धनपतियों के धन के बल पर जुगाड़ फिट करके अपनी तस्वीर निशुल्क कर लेते है।
अगर सियासत की बात की जाये तो इस हद तक जाती है कि जो लोग अच्छा कार्य करके समाज में अपनी लोकप्रियता बढ़ाते दीखते है सबसे पहले उनको तोड़ने का काम करती है-और इस टूट के लिए संस्था के शाखा विस्तार के नाम पर अंदर की जड़ को ही तोड़ देती है।
ये लोग अपनी अनुशंसा ही सुनना पसंद करते है- जब भी कोई आलोचना करता है तब उसे समाज विरोधी और धर्म विरोधी भी कह देते है।
समाज में जब किसी संवेदन शील विषय पर आम जन मानस की भावना को समाचार का रूपक दिया जाता है तब ये लोग उन सवालों का जबाब अशालीन तरीके से  देने से  भी नहीं कतराते---ऊपर से नीचे तक गुट बाजी, मिली भगत, और एक दूजे के समूह के हित को साधने के लिए नैतिक मूल्यों के साथ खुल्लम खुल्ला चीरहरण।
आम आदमी की आवाज को दबाने के लिए ,डराने धमकाने के लिए बाउंसर को साथ रखना व् सामाजिक संस्था के मंच पर अपनी धाक दिखाने के लिए प्रशासन का दुरुप्रयोग करना---ये सब अगर सामाजिक मंचों पर दिखे तब ये मंच  राजनीतिक मंचों से भी कही ज्यादा खतरनाक दिखते है।
ये लोग समाज  के खास बनकर,सामाजिक मंचों का इस्तेमाल अपने आपको राजनीतिक और प्रशासनिक  क्षेत्रों में  स्थापित करने के लिए करते है और कुछ लोग तो सेवा के नाम पर  दौलत का मेवा भी बना लेते है।
पर कब तक?
ये तथाकथित अधिक  होशियार लोग ये  नहीं जानते कि वक्त की अदालत में कर्मो का हिसाब भी होता है और पाप का घड़ा भी फूटता है और जब फूटता है तब मखमल के गलीचों पर चलने वाले उन तथाकथित समाज सेवियों पर आम जनता पीकदान की तरह थूकती भी है।
आपके पास दौलत है या रसूख है तो इस मुगालते में मत रहिये कि यह आपके पास हमेशा रहेंगे---ताज और तख्त जब बदल सकते है तब आपका राज फिर कितने दिनों का होगा?
यहां लोग चुनाव जीतने के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं के पन्ने फाड़ देते है और अनैतिकता के अपने पन्ने जोड़ देते है---दिल  जीतने की बजाय यह अनैतिक प्रक्रिया से चुनाव जीतने की कोशिश करते है और इसलिए आम जन सामान्य की आँखों में चुभते है।
ऐसे लोग यह जान ले कि जैसे सियासत का दौर बदला है --नये माप दंड स्थापित हो रहे है वैसे ही अब समाज के आम सामान्य लोग भी जग  रहे है---अब ये लोग जब भी अपना मिजाज बना लेंगे  तब  अराजकता को माफ़ नहीं करेंगे और धक्का देकर ऐसे लोगो को सामाजिक मंचों से बाहर भी निकाल देंगे।
इसलिए अब ये लीपा पोती अधिक दिन नहीं चलेगी और न ही अहम का भाव चलेगा।आप कितने ही बड़े सामाजिक पद पर क्यों न हो आपको आम जन के हर सवाल का विनम्रता के साथ जबाब देना होगा अन्यथा पद  छोड़ना होगा।
इसलिए दिल जीतने की कोशिश कीजिये---चुनाव जीतना बड़ी बात नहीं है--अगर आप दिल हारकर चुनाव जीते है तो वो जीत भी हार की जमीन पर है और जब तक जमीन गवाही नही दे तब वो ईमारत अधिक दिन खड़ी नहीं रह सकती।
समाज के धन को व्यर्थ के आडम्बरों व् अखबारों में अपने आपको स्थापित करने के लिए बंद कीजिये---समाज के आम लोग इसे सहन नहीं कर रहे है।
अगर राजनीति की कुव्वत आपके अंदर है तो जाइये राजनीति के खुले मैदान में और वहां अपने आपको प्रमाणित कीजिए पर सामाजिक संस्था व् आध्यात्मिक मंच को सियासत का अखाडा मत बनाइये।
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज
संर्पक सूत्र--7278027381

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