तीन तलाक सवाल ही सवाल---

जब मन में आया--जब दिल भर गया---छुट्टी दे दो
करना क्या है?
बस तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह दो।
और कमाल देखिये इसके लिए व्हाट्स एप से,फोन से
टेलीग्राम से---कैसे भी कह कर फ्री हो जाओ और उसको उसके हाल पर छोड़ दो।
कारण कुछ भी हो सकता है---और कारण न भी हो तो बनाया जा सकता है---
कोई और भा गई तब फिर इसका भार क्यों उठाया जाए--
वैसे 4 तक की छुट है पर बेवजह इसको गिनती में क्यों लाया जाये?
बिलकुल ऐसे जैसे महिला सिर्फ हाड-मांस का पुतला हो-उसमे कोई रूह नहीं हो---उसके कोई अहसास नहीं हो---उसके कोई अरमान नहीं हो--उसका कोई सम्मान नहीं हो---
जब तक जी चाहा उसको प्रोडक्ट की तरह यूज किया और जब मन भर गया तब उसको फेंक दिया--
जैसे महिला महिला न होकर यूज एंड थ्रो वाला प्रोडक्ट हो गई----
जाने कितनी सदियों से इस तरह के शोषण से महिलाएं दबती,कुचलती, रही है और बेजान सी चलती रही है।
अब दौर बदल रहा है और आवाजें उठी है---प्रधानमंत्री के एक सार्वजनिक बयान के बाद मुस्लिम महिलाओं में एक आस जगी है और वो हिम्मत करके अपने दर्द को बताने लगी है तब यह सवाल बवाल बन कर उन लोगो से पूछ रहा है कि क्या आपके मज़हब में महिलाओं के साथ अन्याय जायज लिखा है।
कोई शरीयत की बात करता है --कोई पाक कुरान के संदर्भ बताता है और इस पर सुधार करने का आश्वासन अब देता है---पर यह नहीं बताता कि पीड़ितों को न्याय आपकी शरीयत क्यों नहीं दिला पाई?
अब बात चली है तो बहुत दूर तक जायेगी---महिला शक्ति अब आगे बढ़ी है तो न्याय भी पायेगी।
अगर हिन्दू संस्कृति की विसंगतियों पर क़ानूनी लगाम लग सकता है तो मुस्लिम महिलाओं को भी न्याय मिलेगा।
संविधान सबसे ऊपर है---उसकी धाराएं जो कहती है वो होना चाहिए---संवैधानिक अधिकारों पर बीच में न गीता आनी चाहिए और न ही कुरान।
मसला महिलाओ के स्वाभिमान और सम्मान का है --उनके अधिकार का है---वो उन्हें मिलना चाहिए।
महिला पुरुष के पांव की जूती नहीं---वो उसकी दिल की धड़कन बननी चाहिए।

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