ममता को धमकी--रूपा का सवाल

बंगाल की मुख्यमंत्री व् तृणमूल पार्टी सुप्रीमो सुश्री ममता बनर्जी को उत्तर प्रदेश के अलीगढ के भाजयुमो नेता योगेश वार्ष्णेय से ममता का सर कलम करने  वाले को 11 लाख ईनाम की धमकी मिली है--जिसकी भाजपा समेत तमाम राजनीतिक पार्टियों ने न सिर्फ निंदा की है वरन् इस तरह की धमकी देने वाले पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

गौरतलब है पश्चिम बंगाल में पिछले दिनों रामनवमी व् हनुमान जयंति पर जूलूस निकालने को लेकर काफी विवादस्पद स्थिति बनी थी।

वीरभूम जिले में पुलिस के लाठी चार्ज पर भी जन मानस के मन में ममता सरकार की तुष्टिकरण नीति पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी।

पर लोकतंत्र में विरोध का तरीका हिंसा नहीं हो सकता और इस तरह की सोच, सभ्य समाज में स्वीकृत नहीं हो सकती।
हम इस तरह के शब्दों की कड़ी भर्त्सना करते है क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ किसी की मौत की सुपारी या जान लेने का फतवा कतई नहीं हो सकता।

भाजपा के केंद्रीय नेताओ ने जम कर इस घृणित सोच की आलोचना की है और यहाँ तक कहा है कि ऐसी सोच  वाला व्यक्ति भाजपाई नहीं हो सकता।

राज्य सभा में फायर नेत्री रूपा गांगुली के बयान पर भी चर्चा हो रही है जिसमे इस घटना के बाद रूपा ने ममता से सवाल पूछा है कि जब बंगाल में तृणमूल के 17 गुंडे उन पर आघात,प्रहार कर रहे थे और पुलिस चुप चाप खड़ी मूक दशक बनी थी तब ममता सरकार ने क्या कार्रवाई की?

रूपा ने कहा कि वो भी तो महिला थी पर तब उस प्रहार को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया?

रूपा गांगुली का यह सवाल अपनी जगह पर सही है क्योंकि उनकी तो जान पर प्रहार हुआ था तब इस विषय को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया।

ममता जी को धमकी मिली है और रूपा जी की तो जान पर बन आई थी--धमकी की सर्वत्र आलोचना हो रही है जो होनी भी चाहिए--पर रूपा की जब जान जोखिम में थी तब ममता सरकार ने एक महिला होने के नाते एक महिला पर हुए प्रहार पर क्या कार्रवाई की यह सवाल रूपा का जायज़ है पर लोग इसे ममता को मौत की धमकी देने वालों के समर्थन के रूप में देख रहे जो उचित प्रतीत नहीं होता।

अशालीन हर बयान की हम निंदा करते है क्योंकि विरोध शालीन शब्दो में वाजिब तरीके से भी किया जा सकता है।

मारने की सुपारी देने या फतवा देने वाले का कभी समर्थन नहीं किया जा सकता।

बंगाल की धरती से जब प्रधानमंत्री के लिए अशालीन शब्दावली व् फतवे का रूपक बना है तब ममता सरकार ने कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की? यह सवाल भाजपा की तरफ से आ रहा है और उसको अनुचित नहीं कहा जा सकता।

ममता जी की सरकार पर हिंदी भाषियों के साथ भेदभाव व् एक वर्ग पर मेहरबान का आरोप अब जनमानस की भावना में आ गया है इसलिए ममता जी की सरकार से राज धर्म निभाने सबको एक नजर से देखने का निवेदन तो किया जा सकता है।

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