एक शब्द ग़ुलामी पर सोचिये

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घर-परिवार,रिश्तों-नातो से होते हुए दोस्तों की महफ़िल----

कई बार कुछ न  कहने के लिए मजबूर खुद होते है
और कई बार दिल को हल्का करने की कोशिश में गर आप पोस्ट में अपना दर्द लिख जाते है तब भी आप कारण बताओं नोटिस के घेरे में होते है।

यह गुलामी तब तक अच्छी भी लगती है जब तक आपको अपनत्व से समझा जाता है---भूल होने पर प्यार से आपको समझाया जाता है---
पर उस अपनत्व के स्थान पर तंज का जलता नमक लगे तब वो गुलामी कराह बैठती है।
कई बार कहने-समझने के मायने अलग होते है--जो कहा नहीं होता वो समझ लिया जाये तब अर्थ के  अनर्थ भी हो जाते है।
इसका अर्थ यह नहीं कि समझने वाले की गलती है--वो अपनी जगह ठीक होता है क्योंकि उसको वो उस रूप में दीखता है और इन हालातों में कहने वाला उस रूप में गुनाहगार न होने के बाद भी समझने वाले की निगाह में दोषी होता है और शिकायत,उपालम्भ सहना उसकी मजबूरी हो जाती है।
और तब ये ग़ुलामी जो प्यार,स्नेह के सत्कार से कुबूल हुई होती है वो छटपटाती है---
प्यार में गुलामी अच्छी लगती है
पर जब वो ही आपके सम्मान का मर्दन  करता  है जो खास होता है तब-------
वो वेदना,वो दर्द बयान करना भी मुश्किल हो जाता है।
इसलिए भावनाओ पर नियंत्रण जरुरी है----अन्यथा आपको दोहरी पीड़ा  झेलनी पड़ती है ।
यह पीड़ा पारिवारिक भी हो  सकती है और परिवार के बाहर उन लोगों से भी जिनको आप अपना करीब समझते है।
भावनाओं पर चोट किसी भी रूप में क्यों न हो वो गलत ही होती है --अगर हम किसी का विश्वास तोड़ते है तो यह गुनाह हमारा होता है और कोई हमारे उस भाव का जो उसके लिए खास होता है उस पर प्रहार करता है तब भी गुनाह होता है।
टूटन और जुड़न भावनाओ से ही होती है----

रिश्ते को मजबूती पर ले जाने के लिए वक्त लगता है पर उसको खंडित करने के लिए कुछ शब्द ही काफी होते है।
तब लगता है शब्दों का प्रयोग बहुत सोच समझ कर ही किया जाना चाहिए--क्योंकि शब्द रिश्ते में प्राण भी फूंक देते है और बाण बनकर खत्म भी कर देते है।
हम शब्दों के पथिकों के लिए यह विशेष सावधान रहने की बात है क्योंकि अनजाने ही भूले हो जाती है और इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

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