सियासत और समझ यह बात अधिकतर समझ में न आने वाली ही होती है क्योंकि सियासत में कुटिल बुद्धि जिसे कूट नीति भी कहते है वो तो खूब होती है पर समझ बुद्धि यह कम ही दिखती है इसलिए सियासत वाले अपनी हार-जीत की व्याख्या भी अक्सर इस रूप में लेते है कि उन की वो बुद्धि कुबुद्धि सी ही लगने लगती है।
अब महाराष्ट्र में परिषद,नगर पालिका मंडल के चुनावों के परिणामो को ही देखे तो एक नजर में शिव सेना भले ही पहले पायदान पर क्यों न दिखे मगर हकीकत के पटल पर इस परिणाम को कसने से सिर्फ 2 सीट के अंतर से यह पहला स्थान भी शिव सेना के लिए शिकस्त से कम नहीं है।
जिस भाजपा को शिव सेना ने महाराष्ट्र में तुच्छ सा समझा था और सम्मानजनक सीट देने से इंकार करके गठबंधन को तोड़ने का जो मिजाज दिखाया उसी भाजपा ने लगभग समूचे महाराष्ट्र में कमल खिला कर शिव सेना को करारा जबाब दे दिया।
मुंबई और ठाणे को छोड़कर शिव सेना और कही अपनी ताकत नहीं दिखा सकी वहीँ भाजपा ने मुंबई पर नेक टू नेक सी टक्कर देकर शिव सेना को यह बता दिया कि महाराष्ट्र की सियासत में पहले पायदान पर अब भाजपा है और शिव सेना से उसका कद अब काफी बड़ा है।
यह सच है कि एक वक्त शिव सेना की छत्र छाया में ही भाजपा चली थी पर वो वक्त बाला साहेब ठाकरे का था और शिव सेना की ताकत,जज्बा भी तब अलग था।
जो बात बाला साहिब में थी वो बात न तो उद्धव और न ही राज ठाकरे में दिखती है--राज ठाकरे का कुछ अंदाज बाल साहिब सा जरूर दिखता है पर वो गरिमा,वो सम्मान जो बाला साहिब के व्यक्तित्व को मिलता था अब वो किसी में नहीं है और शायद इसलिए भाजपा अब महाराष्ट्र की राजनीति में नंबर वन की पार्टी बन गई है।
मुम्बई के परिणाम शिव सेना के लिए जश्न की बात नहीं बल्कि चिंता के सवाल है पर यह बात अलग है कि उद्धव दिखावे का जश्न मना रहे है।
यह उद्धव के अहम की हार है और भाजपा के विस्तार की जीत है अब देखना यह है कि क्या उद्धव हकीकत की जमीन पर खड़े होकर इस कड़वे सच को स्वीकार करते हुए भाजपा से प्रीत के तार जोड़ते है या फिर बनावटी जश्न में भीतर के दर्द को भूलने की कोशिश करते है।
अब अगर यह गठ बंधन बना तो निर्णय का अधिकार भाजपा के पास ही होगा--क्योंकि जनता की अदालत ने भाजपा को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां कभी शिव सेना रहा करती थी।
वक्त-वक्त की बात है पर समझदारी वक्त को देख कर चलने में ही होती है क्योंकि वक्त से सामना मुमकिन नहीं होता और सियासत में तो जहा नम्बर वहां खिदमत का उसूल है ही इसलिए यहाँ न तो अपनी ताकत का झूठा वहम रखना चाहिए और न ही बे वजह का अहम।
अगर और अधिक संजीदगी से चुनाव परिणाम का विश्लेषण किया जाये तो यह शिव सेना पर तमाचा और भारतीय जनता पार्टी को भरपूर समर्थन का परिणाम है पर तमाचे को भी जीत समझ कर अगर वो जश्न मना रहे है तो कोई क्या कहे?
अब महाराष्ट्र में परिषद,नगर पालिका मंडल के चुनावों के परिणामो को ही देखे तो एक नजर में शिव सेना भले ही पहले पायदान पर क्यों न दिखे मगर हकीकत के पटल पर इस परिणाम को कसने से सिर्फ 2 सीट के अंतर से यह पहला स्थान भी शिव सेना के लिए शिकस्त से कम नहीं है।
जिस भाजपा को शिव सेना ने महाराष्ट्र में तुच्छ सा समझा था और सम्मानजनक सीट देने से इंकार करके गठबंधन को तोड़ने का जो मिजाज दिखाया उसी भाजपा ने लगभग समूचे महाराष्ट्र में कमल खिला कर शिव सेना को करारा जबाब दे दिया।
मुंबई और ठाणे को छोड़कर शिव सेना और कही अपनी ताकत नहीं दिखा सकी वहीँ भाजपा ने मुंबई पर नेक टू नेक सी टक्कर देकर शिव सेना को यह बता दिया कि महाराष्ट्र की सियासत में पहले पायदान पर अब भाजपा है और शिव सेना से उसका कद अब काफी बड़ा है।
यह सच है कि एक वक्त शिव सेना की छत्र छाया में ही भाजपा चली थी पर वो वक्त बाला साहेब ठाकरे का था और शिव सेना की ताकत,जज्बा भी तब अलग था।
जो बात बाला साहिब में थी वो बात न तो उद्धव और न ही राज ठाकरे में दिखती है--राज ठाकरे का कुछ अंदाज बाल साहिब सा जरूर दिखता है पर वो गरिमा,वो सम्मान जो बाला साहिब के व्यक्तित्व को मिलता था अब वो किसी में नहीं है और शायद इसलिए भाजपा अब महाराष्ट्र की राजनीति में नंबर वन की पार्टी बन गई है।
मुम्बई के परिणाम शिव सेना के लिए जश्न की बात नहीं बल्कि चिंता के सवाल है पर यह बात अलग है कि उद्धव दिखावे का जश्न मना रहे है।
यह उद्धव के अहम की हार है और भाजपा के विस्तार की जीत है अब देखना यह है कि क्या उद्धव हकीकत की जमीन पर खड़े होकर इस कड़वे सच को स्वीकार करते हुए भाजपा से प्रीत के तार जोड़ते है या फिर बनावटी जश्न में भीतर के दर्द को भूलने की कोशिश करते है।
अब अगर यह गठ बंधन बना तो निर्णय का अधिकार भाजपा के पास ही होगा--क्योंकि जनता की अदालत ने भाजपा को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां कभी शिव सेना रहा करती थी।
वक्त-वक्त की बात है पर समझदारी वक्त को देख कर चलने में ही होती है क्योंकि वक्त से सामना मुमकिन नहीं होता और सियासत में तो जहा नम्बर वहां खिदमत का उसूल है ही इसलिए यहाँ न तो अपनी ताकत का झूठा वहम रखना चाहिए और न ही बे वजह का अहम।
अगर और अधिक संजीदगी से चुनाव परिणाम का विश्लेषण किया जाये तो यह शिव सेना पर तमाचा और भारतीय जनता पार्टी को भरपूर समर्थन का परिणाम है पर तमाचे को भी जीत समझ कर अगर वो जश्न मना रहे है तो कोई क्या कहे?
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