चुनावों में दागी प्रत्याशियों के अनुपात को देख कर हमको चाहे कितनी ही खीज क्यों न आये पर सियासत बिना दागियों के बिना नहीं चल सकती--शायद इसलिए सियासत में सुधार की बड़ी बात करने वाली भाजपा ने यु पी चुनाव में सबसे अधिक दागी उम्मीदवार उतारे है।
जिनके सर पर खून,अपहरण,फिरौती,योन शोषण जैसे इल्जाम हो और वो व्यक्ति सियासत की पार्टियों का अगर पसंदीदा हो तब समझ लीजिए कि सियासत की सोच क्या है और सोच अगर यही है तब परिणाम भला क्या होगा?
जुबान से सियासत में सुधार और स्वच्छ्ता की चाहे बाते लाख हो पर हकीकत में गुंडई का दामन नहीं छोड़ने वाली इस सियासत से यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि दागी क्या सियासत के लिए विशेष ब्रांड होते है या फिर दागी होने का अर्थ सियासत में नामी होना समझा जाता है।
सवाल यह भी है क्या नैतिक ,सुशिक्षित उम्मीदवार चुनावी रण नहीं जीत सकते या फिर जनता भी अपने विवेक से सही निर्णय नहीं लेने की भूल करती है।
दागी और दबंग उम्मीदवारों का खोफ क्या वोट खिंच कर ले आता है-नैतिक गुण वाला उम्मीदवार अनैतिक गन के सामने नहीं चल पाता!
कारण कुछ भी क्यों न हो पर सियासत को साफ करने की हिम्मत तो कोई दिखाये ?
जोखिम भला कौन ले और क्यों ले?
सत्ता के ताज को सियासत को साफ करने की मुहिम से क्यों गंवाया जाए----जब सियासत सुधार नहीं करना चाहती तब आखिरी विकल्प जनता ही तो बचती है पर उसे भी जाती,धर्म ,भाषा से बाहर निकल कर उम्मीदवार को पहचानने की फुरसत कहां है?
और दबंगई और दागियों का खेल बदस्तूर जारी है और तब तक चलेगा जब तक जनता की नींद नहीं टूटेगी।
यह मुझे भी मालूम नहीं कि जनता क्या सचमूच सियासत में सुधार की चाह से कब उठेगी या फिर कुम्भकर्ण की नींद में सोई रहेगी।
जिनके सर पर खून,अपहरण,फिरौती,योन शोषण जैसे इल्जाम हो और वो व्यक्ति सियासत की पार्टियों का अगर पसंदीदा हो तब समझ लीजिए कि सियासत की सोच क्या है और सोच अगर यही है तब परिणाम भला क्या होगा?
जुबान से सियासत में सुधार और स्वच्छ्ता की चाहे बाते लाख हो पर हकीकत में गुंडई का दामन नहीं छोड़ने वाली इस सियासत से यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि दागी क्या सियासत के लिए विशेष ब्रांड होते है या फिर दागी होने का अर्थ सियासत में नामी होना समझा जाता है।
सवाल यह भी है क्या नैतिक ,सुशिक्षित उम्मीदवार चुनावी रण नहीं जीत सकते या फिर जनता भी अपने विवेक से सही निर्णय नहीं लेने की भूल करती है।
दागी और दबंग उम्मीदवारों का खोफ क्या वोट खिंच कर ले आता है-नैतिक गुण वाला उम्मीदवार अनैतिक गन के सामने नहीं चल पाता!
कारण कुछ भी क्यों न हो पर सियासत को साफ करने की हिम्मत तो कोई दिखाये ?
जोखिम भला कौन ले और क्यों ले?
सत्ता के ताज को सियासत को साफ करने की मुहिम से क्यों गंवाया जाए----जब सियासत सुधार नहीं करना चाहती तब आखिरी विकल्प जनता ही तो बचती है पर उसे भी जाती,धर्म ,भाषा से बाहर निकल कर उम्मीदवार को पहचानने की फुरसत कहां है?
और दबंगई और दागियों का खेल बदस्तूर जारी है और तब तक चलेगा जब तक जनता की नींद नहीं टूटेगी।
यह मुझे भी मालूम नहीं कि जनता क्या सचमूच सियासत में सुधार की चाह से कब उठेगी या फिर कुम्भकर्ण की नींद में सोई रहेगी।
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