हिंदुस्तान की सियासत में मजहब,जाति, भाषा,प्रान्त के दखल को
नजरअंदाज गर नहीं किया जा सकता तब उससे भी अधिक आरक्षण
के प्रभाव को भी कम नहीं आँका जा सकता।
अब सवाल यह है कि इन सियासी पार्टियों ने आरक्षण के कटोरे का
सियासत की गली से कितना दुरुप्रयोग किया है?
इस देश के जवानों की शक्ति,उनके आत्म सम्मान को इस कटोरे में
कैद करके वोटों का जखीरा उठाते गये है।
लोगो को आरक्षण की सुविधा देने के बहाने अपनी सत्ता अर्थात कुर्सी
का आरक्षण करवाते गये है।
जिनके हाथ में दशकों से यह कटोरा पकड़ाया हुआ था वो आज भी
उस कटोरे को पकड़े हुए है----इस सियासत ने उनका स्वावलंबन छिन
लिया और अपने नाम कुर्सियों की जैसे रजिस्ट्री सी कर दी।
असहाय,दुर्बल,हिन् बनाने वाली इस सियासत में बदलाव तब ही आ
सकता है जब आरक्षण जाति के आधार पर नहीं होकर आर्थिक आधार
पर हो जायेगा और तब जाति की कुटिल सियासत के पर क़तरे जा
सकेंगे।
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