जब भी समाज में कुछ विसंगतिया इस कदर हावी हो जाती है कि समाज के आम आदमी के मन से व्यथा के सवाल उठने लगते है तब एक कलमकार का यह दायित्व बनता है कि आम जनता के मन के दर्द को शब्दों से आवाज देकर सम्बंधित पक्ष तक पहुंचाए-और वो बात जब लेखनी बनती है तब आम आदमी का समर्थन और कुछ खास लोगो का विरोध भी होता है।
हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि हमने अपना पक्ष ईमानदारी से निभाया या नहीं-एक समाज सुधारक की भूमिका भी कलम निभा सकती है और उसके लिए उसे जीवटता से अपनी राह पर चलना होता है।
फर्स्ट न्यूज़ ने समय समय पर ऐसी चुनोतियों को फर्ज की कसौटी से न सिर्फ हाथ में लिया बल्कि ईश्वर की कृपा से पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने में भी मददगार हुआ इसके लिए हमको अपने पाठक वर्ग का भी विशेष समर्थन मिला।
तेरापंथ धर्म संघ अपने आप में एक खास विलक्षण मुकाम रखता है पर कई बार चमकते चाँद पर भी कुछ लोगो के कारनामे दाग लगा देते है उस वक्त समाज के आम आदमी के मन में भी व्यग्रता दिखती है और तब कलम को भी अपना फर्ज निभाना पड़ता है।
कुछ दिनों से कुछ खास विषय-परिस्थितियों पर चली मेरी कलम के वे सारे पत्र *तेरापंथ* शीर्षक से फर्स्ट न्यूज़ के इस ब्लॉग में आप सबके अवलोकन के लिए रख रहा हूँ।क्योंकि लोग अक्सर उन संदेशो को अपने नम्बर पर भी मांगते है अब उनको भी सुविधा होगी मेरे सारे पत्र एक जगह उनको मिलेंगे और वे अपना निष्कर्ष निकाल पाएंगे।
पहला पत्र
आदरणीय आचार्य श्री महाश्रमण जी
सादर वंदना।
मन के कुछ सवाल जो वर्तमान के परिदृश्य से एक असमंजस के माहौल को बनाते व् बताते से लग रहे है-अपनी उन भावनाओं को आप श्री को समर्पित कर रहा हूँ।
स्नेह भाव से पढियेगा और हकीकत की पृष्ठ भूमि से विचार कीजियेगा और बात गर खरी लगे तो तदनरूप निर्णय कीजियेगा।
आदरणीय
हकीकत कड़वी है इसलिए शब्द भी कड़वे लगेंगे--यह आलोचना नहीं बल्कि हालातों की आवाज़ के रूप में ही इसे पढियेगा और कही अन्यथा लगे तो माफ़ कीजियेगा।
साधु -संत व् गुरु आध्यात्मिक राह बताने के लिए होते है -उनका कार्य भटके हुए मनुष्य को जीवन का सार समझाना व् उसको सत राह पर लाने का होता है।
अगर धर्म गुरु या साधु साध्वी समाज स्वयं अपने प्राथमिक दायित्व को भूल जाए और वो करने लग जाए जिनकी इजाज़त स्वयं उनके आदर्श नहीं देते तो वो घड़ी समाज के लिए दुखद होती है तब यह लगता है समाज को दिशा देने वाले स्वयं राह भूल गए से लगते है।
श्रावक समाज की विभिन्न संस्थाओं के पदों पर कौन आसीन होगा?यह निर्णय अगर धर्म गुरु करने लगे तब अध्यात्म की राह पर हाथ थाम कर कौन चलाएगा?
यह अत्यंत विचारणीय प्रश्न है कि धर्म की मर्यादा में सियासत की घुसपैठ हो गई है-जो मन को न सिर्फ विचलित करती है बल्कि सवाल भी खड़े करती है।
शब्दों की दुनियां से मेरा वास्ता है व् एक पत्रकार होने की वज़ह से बाहर भीतर होने वाली घटनाये व् सम्भावनाओ पर न सिर्फ अपने बल्कि लोगों के विचार भी लेता हूँ तब लोगों के आक्रोश को उबलता भी महसूस करता हूँ पर वे अपनी आस्था की पट्टी लगाकर इसलिए चुप है क्योकि सार्वजनिक रूप से सच बोलने से फिर उनकी गुरु भक्ति भी संदेह के घेरे में आ जाती है।
श्री सुर्रेन्दर जी सुराणा(सिरियारी) से मेरा व्यक्तिगत परिचय नहीं था पर जब उनके निष्कासन का आदेश व्हाट्स अप पर मैंने आप श्री की आवाज़ में सुना तो मुझे लगा कि जरूर कोई बड़ी बात हुई है और जब समाज के लोगो से बात की तो पता चला कि अपने गुरु के फैसले से श्रावक भी हैरान है।
मुझे नहीं मालूम आखिर जिस व्यक्ति ने सिरियारी धाम के लिए उत्कृष्ट अपनी सेवा दी है वो इतना निकृष्ट कैसे हो गया कि उसे तेरापंथ धर्म संघ से निष्काषित करना पड़ा?
अगर उनका गुनाह गुरु इच्छा के विरुद्ध चुनाव लड़ना व् भारी बहुमत से जीतना ही है तब विचारणीय प्रश्न यह है कि गुरु के प्राथमिक दायित्व सभा संस्थाओ के पदाधिकारी बनाना है या नयी पीढ़ी में नैतिक संस्कार को जगाना है व् युवा वर्ग भौतिकता की चमक दमक में न भटके यह बाड़ लगानी है।
एक शब्द पथिक होने के नाते मै धर्म सम्प्रदाय के मकानों में नहीं उलझता ।मेरे लिए तो हर वो ज्ञानी गुरु है जो जीवन दर्शन को समझाता है।
चूँकि मेरा जन्म तेरापंथ समाज में हुआ है इसलिए तपस्वी आचार्य भिक्षु के पंथ के प्रति मेरा सर हमेशा झुका रहा है व् रहेगा।
मेरा जुड़ाव मन से आचार्य तुलसी से रहा है -मुझे वो यादें आज भी सुकून देती है क्योकि वे ऐसे गुरु थे जो अपनी समालोचना को भी उतनी तन्मयता से सुनते थे तथा गर बात सच्ची हो तब अपने निर्णय को गलत मानने अर्थात भूल स्वीकार करने में भी नहीं चूकते थे।
उसके बाद न तो आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी व् न ही आप श्री का सान्निध्य पाने का सुअवसर मिला इसलिए मेरे लिए बिना गहराई से जाने कुछ भी कहना उचित नहीं है पर जो कुछ सुन रहा हूँ -,पढ़ रहा हूँ वो अत्यंत विचारणीय है।
मेरा अनुरोध है कि समाज में गुटबाजी अर्थात दलबन्दी खत्म हो और सिर्फ दौलत के अमीर की ही न सुने-थोड़ी जमीर वालो की भी सुने और समाज के आम वर्ग को हाशिये पर न रखा जाये।
बिना किसी ईगो के गलतिया सुधारी जाए--समाज भवन निर्माण से नहीं बल्कि व्यक्तित्व निर्माण से प्रगति करेगा।जब तेरापंथ के प्रणेता खुद भवन निर्माण के खिलाफ थे तब आज भवन निर्माणों की दौड़ क्यों लगी है?
क्या हमने आचार्य भिक्षु के आदर्श को
कही किनारे करने की गलती तो नहीं कर दी?
भवन निर्माणों की कतारे और उनके आंकड़े समाज की प्रगति का ग्राफ नहीं हो सकते।
हमे विचार करना होगा कि समाज के लिए शिक्षा केंद्र,व् स्वास्थ्य केंद्र की उपयोगिता है और वो सेवा क्या समाज के आम आदमी तक जा रही है?
समाज के कमजोर तबके के लिए हमने ऐसे क्या प्रकल्प किये है जिनसे उनके स्वाभिमान की गरिमा को सुरक्षित रखते हुए उनको हम आवश्यक सहायता प्रदान कर सके।
आडम्बरों के ताम झाम पर लाखों करोड़ों का वो खर्च बन्द होना चाहिए और समाज के अनुदान कर्ता के हर पैसे को समाज के हितार्थ लगाया जाना चाहिए।
मुझे संकीर्ण मानसिकता अखरती है क्योकि हम दूसरे समाजो के बौद्धिक वर्ग के विचारों को ग्रहण करने करवाने में हिचकते है।
ज्ञान कही से भी मिले लिया जाना चाहिए और हर ज्ञानी वो चाहे किसी भी समाज का क्यों न हो उसका मान किया जाना चाहिए।
समाज में युवा शक्ति विशेषकर तेरापंथ युवक परिषद की सक्रियता व् रक्त दान के क्षेत्र में मानवीयता का बड़ा कार्य इन दिनों ही सम्पादित किया गया है ।युवक परिषद के समस्त कार्यकर्ता अभिनंदन के पात्र है।
मुझे यह मानने में भी कतई संकोच नहीं है कि समाज की अन्य संस्थाओ में कुछ लोग अपना श्रम, समय मन से अर्पित कर रहे है ।उनके इस योगदान को कम नहीं आँका जा सकता।
मुझे शिकायत है उनसे जो समझ रहे है कि गलत हो रहा है पर फिर भी खामोश है।बहुत बड़ा गुनाह वे जान बुझ कर करे जा रहे है।
चिंगारी को देख कर उसको न बुझाना ये उतना ही बड़ा गुनाह है जितना आग लगाना।
हम अच्छी बातो का विस्तार करे पर गलतियों की अनदेखी भी न करे-उनका सुधार त्वरित होना जरुरी है।
सराहना सबको अच्छी लगती है पर आलोचना सुनने का मन भी जरुरी है और सुधार का संकल्प भी जरुरी है।
एक बात बहुत जोर देकर फिर दोहराना चाहूँगा कि साधु साध्वी समाज की भूमिका आध्यात्मिक मार्गदर्शन व् जीवन निर्माण करवाने की ही होनी चाहिए न कि संस्थाओ के निर्माण,उनके पदाधिकारियो के चयन,की होनी चाहिए जो कि हो रही है ।
आध्यात्मिक मंचों की गरिमा का ख्याल हम सबको रखना चाहिए ।हमारा फोकस हमारे समाज के आम वर्ग पर होना चाहिए न कि सियासत् व् फ़िल्मी सितारों की भीड़ बनाने व् अपने संपर्क दिखाने में होना चाहिए।
कभी कभी अगर उच्च पदस्थ सियासत के यशस्वी लोग आते है तब उनका एक आकर्षण व् महत्ता भी रहती है पर अक्सर उनकी उपस्थिति फिर आयोजन व् विषय की आत्मा को ही बदल देती है।
समाज के आम आदमी को सम्मान दीजिये क्योकि आयोजनों की असली शोभा उनसे ही बनती है-हकीकत बहुत कड़वी है क्योकि समाज चंद खास लोगों के बीच ही सिमट सा गया लगता है--आम श्रावक कही खो से गए है।
आम आदमी ही असली ताकत है और हम उनको अनदेखा कर रहे है।
आपसी टकराव हर कीमत पर खत्म हो--अध्यात्म का यह पथ व्यक्तित्व का निर्माण करे--भवन निर्माणों की दौड़ कम हो।
अगर धर्म संघ में साधक समाज कही मर्यादा से बाहर चलते दिखे तब उनके गुनाह ढकने की अपेक्षा उन्हें कड़ा दंड मिले-मै विस्तार में इस बात को नहीं कहुंगा-आप श्री उस मर्म को समझ ही लेंगे जिसको मै कहना चाहता हूँ।
श्री सुरेन्द्र जी सुराणा(सिरियारी) के निष्कासन के निर्णय समाज के आम आदमी के गले नहीं उतर रहा।
मुझे नहीं मालुम कि ऐसी बड़ी भूल क्या हुई?
मगर उनकी सिरियारी को चमन बनाने में अदा की गई भूमिका भी नहीं भुलाई जा सकती।
निष्कासन तो अक्षम्य अपराध पर ही दिया जा सकता है।
इस मसले के परिणाम गंभीर हो सकते है इसलिए अगर यह निर्णय बदला जा सके तो पुनर विचार किया ही जाना चाहिए।
मेरा यह पत्र सैद्धान्तिक धरातल से होता हुआ भावनात्मक अधिक है।
अगर मेरे भावों से आपका दिल आहत महसूस करे तो मै अग्रिम क्षमा चाहता हूँ।
पर जब समाज के आम आदमी के दिल में सवालो की मचलन हो तब एक पत्रकार के रूप में मेरा यह कलम धर्म मुझे उत्प्रेरित करता है।
मुझे विश्वास है कि कड़वे सच को आप श्री मिठास के साथ ग्रहण करेगे।
आभार।
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज़(कोलकाता)
संर्पक सूत्र-7278027381
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