इस आलेख की शुरुआत ही *अफ़सोस* से करनी पड़ रही है क्योंकि जो घटनाक्रम शब्दो के माध्यम से सामने आ रहे है वे यह साफ बता रहे है कि अब ये तेरापंथ वो नहीं रहा जिसको क्रन्तिकारी आचार्य भिक्षु जी ने *हे प्रभो यह तेरा पंथ* कह कर अपनी साधना यात्रा को एक अभिनव मोड़ दिया था।
अब ये *मेरा पंथ* जैसा स्वरूप बन गया है जहाँ कुछ चाटुकारो का नियंत्रण है और समूचे धर्म संघ व् समूचे तेरापंथ समाज के साथ कुछ लोगो का षड्यंत्र है।
मीनाक्षी बुच्चा जी के साथ घटित घटनाओ की खबर मेरे पास बहुत पहले भी आई थी पर मेरा उनसे विशेष परिचय नहीं था इसलिए बिना सटीक तथ्य जाने मेरे लेखन की मर्यादा में नहीं था पर कुछ दिनों से एक औडियो मैंने सुना जिसमे मीनाक्षी जी जिस तरह से प्रतिवाद कर रही थी अपने आत्म सम्मान के लिए।
वाह जे टी ऍन---खूब।शब्दो की दुनिया से सियासत का अखाडा सा बना हुआ लगा।
अफ़सोस शब्दो की दुनिया के पथिक मीनाक्षी जी के सामने ऊपरी दबाब,के रूप में विश्राम लेने के लिए गिड़गिड़ाते दिखे।
यह ऑडियो क्लिप इस बात का संकेत है कि धर्म के नाम पर अधर्म का पोषण और संरक्षण खुले आम चल रहा है।
यह ऑडियो क्लिप इस बात का संकेत है कि एक महिला के आत्म सम्मान का हरण कुछ इस तरह से हो रहा है जैसे महाभारत में दुशासन और दुर्योधन ने किया था पर वो सभा तो अंधे धृतराष्ट्र की थी और गांधारी ने आँखों पर पट्टी बांध रखी थी पर यहाँ तो खुली आँखों में सियासत और अपनी कमजोरियों की पट्टी बंधी हुई लग रही है।
मीनाक्षी जी से मेरा एक सवाल है कि अगर आपके साथ किसी संत ने गलत आचरण की कोशिश की थी तब उस पर एफ आई आर क्यों नहीं की?
संत पर तो पहले होनी चाहिये क्योकि सादे लिबास में गर वो गलत आचरण कर रहे है तब समाज की बहू बेटियों के लिए वो खतरा है।
जिनको हम नमन करते है अगर वो ही आचरण हिन् है तब सबसे अधिक गुनाहगार तो वो है।
जब आपकी बात सुनी नहीं जा रही--एक नारी के आत्म सम्मान को न्याय समाज से नहीं मिल रहा तब आप इस देश के न्याय से मांगिये न्याय---क्योकि देश का संविधान भारत के हर नागरिक को यह अधिकार देता है।
अब रण चंडी ही बनना होगा---तभी जो ख़ामोशी का आवरण ओढ़े हुए है उन्हें लगेगा कि यह तूफान कितना खतरनाक हो गया?
मैंने इतने पत्र आचार्य श्री महाश्रमण जी को निवेदित किये पर एक का भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जबाब नहीं।
शायद रद्दी की टोकरी में चले गए होंगे।
शब्दो की अवेहलना की भी वक्त सजा देता है---कब तक सच को रद्दी की टोकरी का स्थान देते रहिएगा?
अब तक लोगो के मन के सवाल आपको विरोध लग रहा है ---आने वाले दिनों में यह एक कदम और आगे बढ़ कर *विद्रोह* बन सकता है।
याद रखियेगा *विरोध* में शालीनता रहती है पर *विद्रोह* वो भी नहीं रखता।
एक कलमकार होने के नाते हम वर्तमान के स्वरूप से भविष्य की संभावनाओं का अंकन कर लेते है और अफ़सोस है मुझे कि जन भावना के मन के उबाल को आपने समाधान नहीं दिया इसलिए अब ये चिंगारी कभी भी शोला बन सकती है।
सिरियारी में श्री सुराणा जी ने पदभार ग्रहण किया --खबर है वहां विराजित मुनि वहां से चले गए।
वाह।दुसरो को राग द्वेष से मुक्त रहने का संदेश देने वाले अपने ही गुरु की उस पावन भूमि को छोड़ कर चले गए।
यह प्रश्न विचारणीय है---तब लगता है कि श्रावक अधिक अच्छे है कम से कम वेश परिधान के इन कपड़ो की गरिमा के साथ तो मजाक नहीं करते।
हां एक अच्छा कदम जो लगा उसकी सरहाना भी करूँगा कि श्री सुराणा के सिरियारी पद ग्रहण पर और कोई विरोधी चाल नहीं चली गई --इसके लिए अवश्य साधुवाद।
पर अनेको सवाल जबाब चाहते है--उनका क्या होगा?यह जरूर सोचियेगा।
मेरे मन में सम्हाल रखी थी कुछ श्रद्धा।
अब वो बची खुची श्रद्धा भी इन घटनाकर्मो को देख कर नहीं रुकी है।
मुझे आचार्य भिक्षु के उसूलो वाले तेरापंथ की तलाश है---
यह तो कुटिल सियासत का कुछ और लग रहा है-----अगर इसे तेरापंथ कहना है तब भिक्षु के उसूलो की तरफ आइये----अन्यथा भिक्षु के तेरापंथ की गरिमा न घटाइए।
बहुत दिनों से मै सिर्फ घटनाकर्मो को पढ़ रहा था--लिखा नहीं था।
पिछले कुछ दिनों से मेरे पास लोगो का यह सवाल आया कि आप खामोश क्यों हो?हो सकता है उनके मन में मेरी ख़ामोशी को लेकर कुछ और सवाल भी आ गए होंगे।
मै खामोश था क्योंकि यह तूफान से पहले की खामोशी थी शायद।
सच को बयां करते शब्दो को रद्दी की टोकरी में फेकने की सजा माँ शारदे तय करेंगी।
आम जन के सवालों को मेरे जिन शब्दों ने उठाया उनको नजरअंदाज करना इतना आसान न समझियेगा।
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज़
7278027381
अब ये *मेरा पंथ* जैसा स्वरूप बन गया है जहाँ कुछ चाटुकारो का नियंत्रण है और समूचे धर्म संघ व् समूचे तेरापंथ समाज के साथ कुछ लोगो का षड्यंत्र है।
मीनाक्षी बुच्चा जी के साथ घटित घटनाओ की खबर मेरे पास बहुत पहले भी आई थी पर मेरा उनसे विशेष परिचय नहीं था इसलिए बिना सटीक तथ्य जाने मेरे लेखन की मर्यादा में नहीं था पर कुछ दिनों से एक औडियो मैंने सुना जिसमे मीनाक्षी जी जिस तरह से प्रतिवाद कर रही थी अपने आत्म सम्मान के लिए।
वाह जे टी ऍन---खूब।शब्दो की दुनिया से सियासत का अखाडा सा बना हुआ लगा।
अफ़सोस शब्दो की दुनिया के पथिक मीनाक्षी जी के सामने ऊपरी दबाब,के रूप में विश्राम लेने के लिए गिड़गिड़ाते दिखे।
यह ऑडियो क्लिप इस बात का संकेत है कि धर्म के नाम पर अधर्म का पोषण और संरक्षण खुले आम चल रहा है।
यह ऑडियो क्लिप इस बात का संकेत है कि एक महिला के आत्म सम्मान का हरण कुछ इस तरह से हो रहा है जैसे महाभारत में दुशासन और दुर्योधन ने किया था पर वो सभा तो अंधे धृतराष्ट्र की थी और गांधारी ने आँखों पर पट्टी बांध रखी थी पर यहाँ तो खुली आँखों में सियासत और अपनी कमजोरियों की पट्टी बंधी हुई लग रही है।
मीनाक्षी जी से मेरा एक सवाल है कि अगर आपके साथ किसी संत ने गलत आचरण की कोशिश की थी तब उस पर एफ आई आर क्यों नहीं की?
संत पर तो पहले होनी चाहिये क्योकि सादे लिबास में गर वो गलत आचरण कर रहे है तब समाज की बहू बेटियों के लिए वो खतरा है।
जिनको हम नमन करते है अगर वो ही आचरण हिन् है तब सबसे अधिक गुनाहगार तो वो है।
जब आपकी बात सुनी नहीं जा रही--एक नारी के आत्म सम्मान को न्याय समाज से नहीं मिल रहा तब आप इस देश के न्याय से मांगिये न्याय---क्योकि देश का संविधान भारत के हर नागरिक को यह अधिकार देता है।
अब रण चंडी ही बनना होगा---तभी जो ख़ामोशी का आवरण ओढ़े हुए है उन्हें लगेगा कि यह तूफान कितना खतरनाक हो गया?
मैंने इतने पत्र आचार्य श्री महाश्रमण जी को निवेदित किये पर एक का भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जबाब नहीं।
शायद रद्दी की टोकरी में चले गए होंगे।
शब्दो की अवेहलना की भी वक्त सजा देता है---कब तक सच को रद्दी की टोकरी का स्थान देते रहिएगा?
अब तक लोगो के मन के सवाल आपको विरोध लग रहा है ---आने वाले दिनों में यह एक कदम और आगे बढ़ कर *विद्रोह* बन सकता है।
याद रखियेगा *विरोध* में शालीनता रहती है पर *विद्रोह* वो भी नहीं रखता।
एक कलमकार होने के नाते हम वर्तमान के स्वरूप से भविष्य की संभावनाओं का अंकन कर लेते है और अफ़सोस है मुझे कि जन भावना के मन के उबाल को आपने समाधान नहीं दिया इसलिए अब ये चिंगारी कभी भी शोला बन सकती है।
सिरियारी में श्री सुराणा जी ने पदभार ग्रहण किया --खबर है वहां विराजित मुनि वहां से चले गए।
वाह।दुसरो को राग द्वेष से मुक्त रहने का संदेश देने वाले अपने ही गुरु की उस पावन भूमि को छोड़ कर चले गए।
यह प्रश्न विचारणीय है---तब लगता है कि श्रावक अधिक अच्छे है कम से कम वेश परिधान के इन कपड़ो की गरिमा के साथ तो मजाक नहीं करते।
हां एक अच्छा कदम जो लगा उसकी सरहाना भी करूँगा कि श्री सुराणा के सिरियारी पद ग्रहण पर और कोई विरोधी चाल नहीं चली गई --इसके लिए अवश्य साधुवाद।
पर अनेको सवाल जबाब चाहते है--उनका क्या होगा?यह जरूर सोचियेगा।
मेरे मन में सम्हाल रखी थी कुछ श्रद्धा।
अब वो बची खुची श्रद्धा भी इन घटनाकर्मो को देख कर नहीं रुकी है।
मुझे आचार्य भिक्षु के उसूलो वाले तेरापंथ की तलाश है---
यह तो कुटिल सियासत का कुछ और लग रहा है-----अगर इसे तेरापंथ कहना है तब भिक्षु के उसूलो की तरफ आइये----अन्यथा भिक्षु के तेरापंथ की गरिमा न घटाइए।
बहुत दिनों से मै सिर्फ घटनाकर्मो को पढ़ रहा था--लिखा नहीं था।
पिछले कुछ दिनों से मेरे पास लोगो का यह सवाल आया कि आप खामोश क्यों हो?हो सकता है उनके मन में मेरी ख़ामोशी को लेकर कुछ और सवाल भी आ गए होंगे।
मै खामोश था क्योंकि यह तूफान से पहले की खामोशी थी शायद।
सच को बयां करते शब्दो को रद्दी की टोकरी में फेकने की सजा माँ शारदे तय करेंगी।
आम जन के सवालों को मेरे जिन शब्दों ने उठाया उनको नजरअंदाज करना इतना आसान न समझियेगा।
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज़
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