मर्यादा महोत्सव पर मुनि श्री कुमार श्रमण जी के उदबोधन का भाव प्रवाह वीडियो सुना---वक्तुत्व शैली वाकई में अत्यंत प्रभावी है--काबिल ऐ तारीफ-- पर विचारों की संरचना में श्रद्धा मर्यादा का ताना बाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करते हुए बुना गया और जिस तरह से संघ के प्रति सवालों के वीडियो को इधर उधर प्रेषित करने से मर्यादा की आड़ में न करने की सलाह दी गई उससे एक सन्देश साफ है कि जो हो रहा है और जो होगा उस पर सवाल न किये जाये उसे गुरु इंगित समझ कर स्वीकार किया जाये।
मर्यादा महोत्सव पर श्रावक की मर्यादा अपने उदबोधन से खूबसूरती से बताने की इस कोशिश में सियासत की दबी परत अपना अंदाज बताते दिखी।
खेर अपना अपना विचार और अपना अपना अंदाज है।
शालीन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से रोका जाना नहीं चाहिए क्योकि भारतीय संविधान सबसे ऊपर है और वो इसकी आजादी सबको देता है।
मुझे उम्मीद थी कि धर्म संघ के इस विशेष उत्सव पर आम जन सामान्य के मन के अनुतरित सवालों को समाधान दिया जायेगा पर ऐसा नहीं हुआ बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से जुबान को बन्द रखने की नसीहत दी गई।
एक सन्देश मैंने व्हाट्स अप की पोस्ट पर पढ़ा था उसमे एक श्रावक का वीडियो भी था -मै देख नहीं पाया पर उस सन्देश का भावार्थ जो मै समझ पाया उसमे उनके प्रति एक सवाल था कि पहले उन्होंने भी सवाल उठाये थे और अब एक सम्मान उनको मिला और उन्होंने मर्यादा महोत्सव के उस गरिमामय मंच पर अपने भाषण में गद्दार या किसी अशालीन शब्द का प्रयोग किसी के लिए किया।
अगर यह घटना वाकई में सच है तब मेरा सवाल यही से शुरू होता है कि मर्यादा महोत्सव की मर्यादा का खुले आम यह चीर हरण जैसा क्या नहीं है?
क्या इस गरिमामय मंच का यह गलत इस्तेमाल नहीं है?
क्या आध्यात्मिक मंच किसी पर निशाना अशालीन रूप से साधने के लिए इस्तेमाल हो सकते है?
जहां तक पुरस्कार सम्मान वाली बात है जब ये रेवड़ियों की तरह वितरित होने लग जाए तब उसकी महत्ता कितनी रहती है यह समझदार खुद समझ सकते है और जब इनकी कीमत अप्रत्यक्ष रूप से अनुदान से तय होने लगे तब कोई भी सम्मान चाहे वो सामाजिक हो,साहित्यिक हो या आध्यात्मिक हो -वो बेमोल ही हो जाते है।
यह माहौल उनके लिए विशेष दुखद होता है जिनको ये सम्मान उनकी क़ाबलियत से मिला होता है और जब वो इसको प्रोडक्ट की तरह मिलते देखते है तब उनके मन की व्यथा का आंकलन भी कठिन होता है।
मर्यादा महोत्सव तो मर्यादाओं की महत्ता व् उनकी गरिमा के उत्स का पावन पर्व होता है -- वचन व् वाचन का अर्थ भी तब सवाल बन जाता है जब कोई अशालीन अभिव्यक्ति से मर्यादा उत्स की मर्यादा को तार तार कर दे।
रही बात जिज्ञासा व् आम जन सामान्य के मन के सवालो की---
बहुत अधिक दिन तक श्रद्धा व् आस्था का ठक्कन मुमकिन नहीं होगा फिर जिस दिन यह भावनाओं के तवे से गर्म होकर गिरेगा तब आज के सवाल उस दिन के लिए और कड़वे हो जायेगे।
समय गवाह है कि महावीर,बुद्ध, नानक से लेकर आचार्य श्री भिक्षु जी व् आचार्य श्री तुलसी जी ने भी सवालों के जबाब दिए है उस वक्त भी मर्यादा रही है वो आज भी है पर आज सवाल करने की अप्रत्यक्ष रूप से मनाही ,यह व्यवस्था बदली हुई सी लगती है जो स्वीकृति आम लोगो के मन की नहीं हो सकती।
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज
संर्पक सूत्र-7278027381
मर्यादा महोत्सव पर श्रावक की मर्यादा अपने उदबोधन से खूबसूरती से बताने की इस कोशिश में सियासत की दबी परत अपना अंदाज बताते दिखी।
खेर अपना अपना विचार और अपना अपना अंदाज है।
शालीन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से रोका जाना नहीं चाहिए क्योकि भारतीय संविधान सबसे ऊपर है और वो इसकी आजादी सबको देता है।
मुझे उम्मीद थी कि धर्म संघ के इस विशेष उत्सव पर आम जन सामान्य के मन के अनुतरित सवालों को समाधान दिया जायेगा पर ऐसा नहीं हुआ बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से जुबान को बन्द रखने की नसीहत दी गई।
एक सन्देश मैंने व्हाट्स अप की पोस्ट पर पढ़ा था उसमे एक श्रावक का वीडियो भी था -मै देख नहीं पाया पर उस सन्देश का भावार्थ जो मै समझ पाया उसमे उनके प्रति एक सवाल था कि पहले उन्होंने भी सवाल उठाये थे और अब एक सम्मान उनको मिला और उन्होंने मर्यादा महोत्सव के उस गरिमामय मंच पर अपने भाषण में गद्दार या किसी अशालीन शब्द का प्रयोग किसी के लिए किया।
अगर यह घटना वाकई में सच है तब मेरा सवाल यही से शुरू होता है कि मर्यादा महोत्सव की मर्यादा का खुले आम यह चीर हरण जैसा क्या नहीं है?
क्या इस गरिमामय मंच का यह गलत इस्तेमाल नहीं है?
क्या आध्यात्मिक मंच किसी पर निशाना अशालीन रूप से साधने के लिए इस्तेमाल हो सकते है?
जहां तक पुरस्कार सम्मान वाली बात है जब ये रेवड़ियों की तरह वितरित होने लग जाए तब उसकी महत्ता कितनी रहती है यह समझदार खुद समझ सकते है और जब इनकी कीमत अप्रत्यक्ष रूप से अनुदान से तय होने लगे तब कोई भी सम्मान चाहे वो सामाजिक हो,साहित्यिक हो या आध्यात्मिक हो -वो बेमोल ही हो जाते है।
यह माहौल उनके लिए विशेष दुखद होता है जिनको ये सम्मान उनकी क़ाबलियत से मिला होता है और जब वो इसको प्रोडक्ट की तरह मिलते देखते है तब उनके मन की व्यथा का आंकलन भी कठिन होता है।
मर्यादा महोत्सव तो मर्यादाओं की महत्ता व् उनकी गरिमा के उत्स का पावन पर्व होता है -- वचन व् वाचन का अर्थ भी तब सवाल बन जाता है जब कोई अशालीन अभिव्यक्ति से मर्यादा उत्स की मर्यादा को तार तार कर दे।
रही बात जिज्ञासा व् आम जन सामान्य के मन के सवालो की---
बहुत अधिक दिन तक श्रद्धा व् आस्था का ठक्कन मुमकिन नहीं होगा फिर जिस दिन यह भावनाओं के तवे से गर्म होकर गिरेगा तब आज के सवाल उस दिन के लिए और कड़वे हो जायेगे।
समय गवाह है कि महावीर,बुद्ध, नानक से लेकर आचार्य श्री भिक्षु जी व् आचार्य श्री तुलसी जी ने भी सवालों के जबाब दिए है उस वक्त भी मर्यादा रही है वो आज भी है पर आज सवाल करने की अप्रत्यक्ष रूप से मनाही ,यह व्यवस्था बदली हुई सी लगती है जो स्वीकृति आम लोगो के मन की नहीं हो सकती।
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज
संर्पक सूत्र-7278027381
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