मेरा पत्र 4--26 जनवरी 2017

26 जनवरी 2017
व्हाट्स अप पर एक वीडियो सुना--शायद कुमार श्रमण जी बोल रहे थे।
अभिव्यक्ति सुंदर लगी जब वो कह रहे थे कि तेरापंथ धर्म संघ का आचार्य न तो विरोध से घबराता है और न ही किसी के ईशारे पर चलता है वरन समूचा धर्मसंघ आचार्य के संकेत पर चलता है---दिल को  छूने वाले ये शब्द थे पर हकीकत से बहुत दूर लगे----
जो कार्य करता है उसका विरोध होता है यह बात भी इसमें कही गई तब बहुत लोगों के दिलो में उठ रहे सवालों को भी अपने जबाब तलाशने होंगे और कुछ नए सवाल भी खड़े होंगे--
क्या श्री सुराणा का विरोध इसलिए हुआ कि उन्होंने सिरियारी के लिए बहुत काम किया और निष्कासन की वजह क्या रही? अच्छे कार्य का पुरस्कार समझ लेना चाहिए उनको?

एक बात इस वीडियो में और थी कि आचार्य श्री विरोध का जबाब जुबान से नहीं अपने काम से ही देने के भाव रखते है---बात यह भी बहुत गहरी और वन्दन योग्य है पर जिस निर्णय पर समाज के आम सामान्य के मन में सवाल है गर हम वही अडिग खड़ेे रहे तब फिर वो ज़बाब कैसा?
श्रावक में अहम  की समस्या हो सकती है पर --------गुरु तो इससे मुक्त होते ही है।
जिन्होंने घर से  बेइज्जत करके श्री सुराणा को निकाला उस अभिभावक के मन में वो ममता क्यों नहीं उमड़ती कि उसे आवाज देकर बुलाया जाये।

क्या यह परिपाटी अब चलनी चाहिए जिसमे संघपति से असहमत भी नहीं होना चाहिए--उनके हर इंगित को आँख बन्द कर अनुसरण करना चाहिए।
अब वक्त बदल रहा है आदरणीय जी--
इसलिए विचार,सवाल,जबाब के क्रम तो चलने ही चाहिए क्योकि संवाद से ही शिकायत का समाधान होता है।

आम जन सामान्य सुरेन्द्र सुराणा के गुनाह को जानना चाहता है जिसकी वजह से उन्हें धर्म संघ से निष्काषित किया गया----
ख़ामोशी एक नियत समय पर कुछ सवालों का जबाब भी हो सकती है पर उसका अधिक प्रयोग फिर दुरूपयोग की परिभाषा में आ जाता है।
अगर कार्य से सवालो का जबाब यही है तो यह समाधान नहीं हो सकता---आम श्रावक के मन की व्यग्रता को समाधान देना यह अत्यंत जरुरी है।
अन्यथा अगर चिनगारियों को महत्वपूर्ण नहीं समझा गया तब ये आग का कहर भी बरपा देती है।
बहुत साफ शब्दों में एक स्पष्ट बात कहना चाहता हूँ कि  आम जन भावनाओ का निरादर करने का सीधा अर्थ विरोध को खुल कर विद्रोह के रूपक में बदलने  का वक्त देना है।
गुरु किसी के  ईशारे पर नहीं चलते यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है पर आम लोगों के मन की आवाज़ यह जता रही है कि अध्यात्म की राह से भी सियासत की हवा आ रही है और ये संकेत अच्छे नहीं है ।
मेरा मकसद  विरोध नहीं है--मै संवाद चाहता हूँ उन जन सामान्य लोगो की कतारों के सवालो के समाधान चाहता हूँ।

मै चाहता हूँ कि श्रद्धा आस्था की गरिमा बनी रहे व् कुछ  ठेकेदारो के चंगुल से बची भी रहे ।
मै चाहता हूँ कि संघपति धर्मसंघ व् तेरापंथ समाज के आम श्रावक के मन की व्यथा को न सिर्फ सुने बल्कि प्यार से उसे दूर भी करे।
धर्म संघ के साधू साध्वी परिवार  सभा संस्थाओ के निर्माण व् परिचालन की तमाम प्रक्रियाओ से खुद को दूर रखे।
श्रावक अपनी लक्ष्मण रेखा समझे व् साधू साध्वी भी अपनी  धर्म साधना ज्ञान उपदेश की उस सीमा तक ही रहे।
सियासत के वजीर अगर धर्म पथ के साधक पथिक तय करेंगे तब धर्म की राह कोन समझायेगा?

मेरे शब्दों से अगर कोई दिल आहत हो तो मुझे माफ़ करे--मेरे मन में न तो गुरु के प्रति श्रद्धा कम है और न ही अपने समाज के प्रति विश्वास कम हुआ है।
कुछ विसंगतियां ऐसी दिखी है जिससे  आम श्रावक के दर्द को सुन कर मेरा मन भी आहत हुआ है।
साभार।
संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज़
संर्पक सूत्र 72780 27381

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