मेरा पत्र 10

भ्रान्ति और हकीकत के समूह से विकृत मानसिकता वाली पोस्ट आज मध्यान्ह पढ़ने को मिली---चूँकि उस वक्त मैं अपने कार्य में व्यस्त था तब मैंने बहुत संक्षिप्त में जबाब भी दिया।
अगर कोई अपनी माँ के साथ नहीं रहता या साधु साध्वी के दर्शन नहीं करता तब उसे समाज में अपने सवाल उठाने का हक नहीं है।कुछ ऐसा ही भाव मुझ पर इंगित करते हुए उन पोस्ट में  था और मेरी माँ के घर का पत्ता भी लिखा था।

संजय सनम अपनी माँ के साथ नहीं रहता इस पर आप समाज को क्या बताना चाहते है?
होती है वैचारिक,परिस्थितिया जाने कितने परिवारों को अलग रहना पड़ता है तब क्या वे सभी श्रावक जो किसी भी कारण से अगर अपने माता के साथ नहीं है तब वो समाज की विसंगतियों पर सवाल नहीं कर सकते?
बहुत जल्दी भूल गए 2014 से लेकर अब तक मोदी जी को भी यह कहने वाले कि जो व्यक्ति अपने परिवार को साथ नहीं रख सकता वो देश को कैसे चलाएगा?
जिन जिन लोगो ने यह कहा  वे लोग मोदी के शब्दों से करारे तमाचे खा खा कर अब भी अपने गाल को सहला रहे है।
संमझ गये ना----अब किसी से ये बेतुका सवाल न कीजियेगा।

अगर कोई विचार है तो सटीक तर्क के साथ कहिये --इतने नीचे मत उतरिये कि आपके अपने ही सवाल आप पर भारी पड़ जाये।

किसी की भी निजी जिंदगी के सवाल तब होने चाहिए यदि उसकी क्रिया विधि समाज को प्रतिकूल प्रभावित करती है!

हमारे पास पर्सनल बहुत बाते आती है पर हम उन पर तब तक कलम नहीं उठाते जब तक वो समाज,समुदाय को प्रभावित न करे।
साथ रहना-न रहना ये आपसी पारिवारिक है जिसका निर्णय परिवार के लोग करते है और अपनी अपनी सुविधानुसार एक व्यवस्था तय कर लेते है इस प्रसंग को समाज के ज्वलन्त संदर्भो के सामने इसलिए रखना कि कोई अपनी बात न कह पाये।

तो फिर ये सोचने वाले बहुत गलत फहमी में है क्योंकि परिवार से दूर रहने वाला जब विरोध करने वालो के गाल पर लगातार तमाचे जड़ते हुए सफलता से देश चला सकता है तब समाज का हर श्रावक चाहे वो संयुक्त परिवार में हो या एकल परिवार में हो वो भी समाज की हर विसंगति पर सवाल उठा सकता है और जरूरत पड़ने पर करारे तमाचे भी लगा सकता है।


मैंने ये समाज के आम जन सामान्य श्रावकों के लिए कहा है और उनकी आवाज को कोई न तो रोक पायेगा और न ही दबा पायेगा।

रही बात मेरी तो मैं तब ही लिखता हूँ जब माहौल लिखने को कहता है।अभी बीच में 15 -20 दिन सबकी भावनाओ को पढ़ रहा था कुछ नहीं लिखने पर लोगो के फोन भी आये पर मुझे लिखने के लिए नहीं लिखना।
मुझे तब ही लिखना है जब कुछ घटनाये या प्रतिक्रियाएं ऐसी आ जाये और उस वक्त लिखना गर समय की मांग हो तब ही लिखता हूँ--और  सच्चाई की जमीन से उठी उस कलम को रोकने की ताकत भी नहीं है।
 इन लोगो ने लेखन का लगभग सबसे नीचे का स्तर अपना दिखा दिया है हम अपने मुकाम पर रह कर हकीकत के शब्द जब तब देते रहेंगे।
एक बात श्री सुरेंद्र सुराणा जी के नाम से इस कदर जलन क्यों?
अब काम ऐसा ही करोगे तब तमाचे तो पड़ेंगे ही----शेर को बेवजह चुनोती देने का अंजाम तो ऐसा ही होगा।
अब उसका गुस्सा इधर उधर मत दिखाइए--बल्कि बदलाव अपने भीतर से लाइए।

श्री सुराणा जी से मेरी  अब तक मुलाकात नहीं हुई पर फ़ोन पर बात चित हुई है।

श्री सुराणा के व्यक्तित्व के बारे में मुझे सबसे अच्छी बात यह लगी कि आम जन समुदाय के मन में सिरियारी में इनकी दी गई सेवा के प्रति मान है और जो व्यक्ति आम जनता के दिल में होता है शायद तभी वो तमाम सियासती चालो को उल्ट कर अपना राज तिलक करवा लेता है।

इसका साफ़ अर्थ उस व्यक्ति के सर पर आचार्य भिक्षु की कृपा का हाथ है और अब उनसे जंग लड़ने वालों का हश्र साफ है।

मेरे बारे में आरोप जेब गर्म करने का---अब क्या जबाब दू इन असमझ नादानों को---शायद ये यही करते रहे है और दूसरों को कहते रहे है।

सबके कर्मो का हिसाब वक्त देता है -यहाँ किसी की सिफारिश नहीं चलती।
जो जैसा करता है उसको भुगतना पड़ता है कई बार पिछले जन्मों का पुण्य चलता है तब वे यह भूल जाते है कि पाप की तलपट भी तो आएगी।और जब वो तलपट खुलती है तब हकीकत कड़वी लगती है।
याद रखिए घड़ा पाप  भरता भी है और फूटता भी है-----और आम लोगो को वो दिखता भी है।

समूह भ्रान्ति -हकीकत का था--और वे अपनी विकृत मानसिकता का चेहरा भी दिखा रहे थे और खुद की भ्रांतियों की हकीकत को भी खुद उजागर कर रहे थे।

काश स्वस्थ वैचारिक चिंतन से विचार विमर्श चलता तो सकारात्मक दिखता और उसका परिणाम भी अच्छा आता।

पर जब मानसिकता ही कलुषित हो तब वो इस भरम में रहते है कि हमने कोई तीर चला दिया पर परिणाम में वो तीर खुद का खुद पर ही चलाया होता है।

मेरे सवाल जो आम जन सामान्य श्रावक की बात को कहते है वो तब तक कहते रहेंगे जब तक आम श्रावक मेरे शब्दों से अपनी आवाज उठाना चाहेगा।

मै विरोध की मानसिकता से नहीं लिखता --मै आम जन के विचारों को पहुँचाने की मानसिकता से लिखता हूँ और वो लिखता रहूँगा।
हां अगर हद से आगे बढ़ोगे तो इसका कुछ वैसा ही जबाब मिलेगा।
शालीनता,और मर्यादित सवालो का दिल से स्वागत भी करूँगा।
जो महाशय मुझ से सवाल कर रहे थे  मैंने उनको पूरा परिचय बताने को कहा ताकि आमने सामने सवाल जबाब हो सके पर उन्होंने इसका जबाब नहीं दिया---अब इससे ही उनकी मानसिकता का अंदाज लग सकता है।
एक बात बहुत स्पष्ट ऐसे महानुभाव संमझ ले कि मुझे खबरों का पोस्टमार्टम करने के लिए मजबूर न होना पड़े।
मैं भ्रान्ति के इस समूह में अपनी कोई पोस्ट नहीं दे रहा हूँ क्योंकि यह समूह एक खास एजेंडे की तरह कार्य करता दिख रहा है जो सामाजिक विसंगति व् उनसे जुड़े सवालों पर ठक्कन लगाने का सा काम कर रहा है। इसलिए इस समूह को मै अपने फोन से हटा रहा हूँ।

किसी के मन में मेरे लेखन से जुड़े सवाल हो तो उनका मेरे व्हाट्स एप नम्बर पर हार्दिक स्वागत है।

 निष्पक्ष स्वस्थ चिंतन के आखरों व् भावनाओ का हृदय से अभिनंदन है।

मेरी अगली पोस्ट तेरापंथ युवक परिषद को तोडने के निर्णय पर धर्म संघ के  जोशीले समर्पित  युवाओं की व्यथा,उनके आक्रोश पर संभावित है।

क्या कोलकाता तेरापंथ युवक परिषद को तोड़ने के लिए सभी परिषदों को भी टूटना पड़ रहा है?

क्या कोलकाता तेरापंथ युवक परिषद अपनी रिकॉर्ड तोड़ सक्रियता से इतनी आगे बढ़ गई है कि कुछ नजरो में कांटा बन कर चुभ रही है?

क्या इसके लिए संविधान को भी बदलना पड़ा है?

क्या अनुशाषित,मर्यादित जोशीले युवा इसे अपने आत्म सम्मान पर चोट समझते है?

यह फरमान वापिस क्यों होना चाहिए---?

विषय के सभी सम्बद्ध पक्षो की जानकारी आप सब तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा।


आभार।

संजय सनम
संपादक फर्स्ट न्यूज़
संर्पक सूत्र 7278027381

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