जब दीप माटी के जलते थे
बचपन में हम सब मिलकर
एक एक दीप रखते थे
हवा की बतास जब भी
जोर से आती थी
ये दीपक संघर्ष करते दिखते थे
तब सब मिलकर
एक दूजे की देहरी पर दीप रखते थे
वो दिवाली आज भी याद आती है
क्योंकि तब सिर्फ दीप जलते थे
पर दिल उस रोशनी में मिलते थे
अब दिवाली का अंदाज
हमने बदल दिया है
माटी के दीपों की जगह
चाइना की रोशनी आ गई है
अब दीप की जगह
दिलों की जलन आ गई है..
हम मिलते भी रस्मों की तरह है
पराए से अहसास की छांव आ गई है
गांव की उस दिवाली की
फिर याद आ गई है...
जहां अपनत्व का अहसास दिखता था..
समृद्धि का तमाशा नहीं था
लक्ष्मी का सम्मान दिखता था
बड़े बुजुर्गो के प्रति
आदर का वो भाव दिखता था
स्कूल की छुट्टियों से ही
दिवाली का चाव दिखता था
पड़ोस की काकी ताई
पकवानों की वो कढ़ाई
वो यादें आज फिर याद आ गई है
काश दिवाली की वो रौनक
माटी के दीपों की वो कतारे
लक्ष्मी की वो रेल, मांडने
घूंघट में छिपे वो चेहरे
दिलों की मिठास...अपना सा अहसास..
फिर आ जाए..
हमे ये कृत्रिम रोशनी नहीं चाहिए
हवा से लड़ते माटी के दीपकों की कतारें फिर आ जाए...
बचपन की वो दिवाली फिर आ जाए
घुले मिली वो निशानी फिर आ जाए
गांव की दिवाली की वो रौनक
काश सारे शहरों में छा जाए...
दीपावली की आप सबको दिल से शुभ मंगल कामनाएं....
संजय सनम(सपरिवार)
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