*उपाधि एक व्याधि*
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एन. सुगालचंद जैन
चेन्नई, तमिलनाडु
उपाधि के विषय में यह विचार गीताप्रेस - गोरखपुर के संस्थापक संपादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के है| श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने गीताप्रेस – गोरखपुर के माध्यम से धार्मिक जन-जागरण का अद्भुत व अतुलनीय कार्य किया| उनके इस कार्य के लिए भारत के प्रथम राष्ट्रपति महामहिम डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी, श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से अलंकृत करना चाहते थे|
अतः डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने तत्कालीन गृहमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत जी के साथ एक पत्र देकर भेजा जिसमें अलंकरण की स्वीकृति के लिए श्री हनुमान प्रसाद पौद्दार जी से स्वीकृति मांगी|
इसके प्रतिउत्तर में श्री पोद्दारजी ने लिखा कि “मैं भारत के राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू का बड़ा आदर करता हूँ| लेकिन आपने और उन्होंने जो अनुग्रह मुझ से किया है वह मैं स्वीकार नहीं कर सकता हूँ|
क्योंकि मेरे लिए उपाधि एक व्याधि है| जिस मार्ग पर मैं चल रहा हूँ, मेरे जो उद्देश्य है, उसके लिए यह उपाधि बाधा बन सकती है| अतः आप ही बताइए मैं व्याधि को कैसे स्वीकार करूँ| क्या आप कहेंगे कि मैं बीमार हो जाऊं|”
इसके प्रतिउत्तर में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने लिखा कि “कुछ लोग उपाधियों से ऊँचे होते हैं, उनमें से एक आप है|”
क्या वर्तमान समय में भी कोई व्यक्ति स्वयं को उपाधियों से ऊपर उठा सकता है?
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