**साधु कौन – 1*
*Who is Saint - 1*
आजकल साधुओं के बारे में अनेक नकारात्मक खबरें आती है जिससे मन बड़ा व्यथित होता है| हम नित प्रतिदिन अख़बारों में पढ़ते है कि फलां व्यक्ति साधु के वेश में धूर्त निकला, पुलिस उसको पकड़ कर ले गई, महिलाओं का शोषण किया, पुरूषों की जेब ढीली की, जनता जनार्दन को सब्जबाग़ दिखाकर लूटा| इन सबसे आस्थावादी जनमानस को बहुत बड़ा धक्का लगता है|
उनकी आस्था एवं विश्वास पर कुठाराघात होता है| मेरा विचार है क्यों न एक ऐसी पुस्तक की रचना करवाई जाये जो साधु एवं साधुता पर प्रकाश डालते हुए साधुओं के गुणों से अवगत करवाएं| जिससे हम साधुजन को उनके वेश से नहीं अपितु साधु में विद्यमान गुणों से पहचान पाए|
जैन दर्शन में साधु-साधुत्व के पर्याप्त मापदण्डों का विधान है| जैन धर्म के अनुसार जो सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान एवं सम्यकचारित्र रूप रत्नत्रयमय मोक्षमार्ग की निरन्तर साधना करते हैं तथा समस्त आरम्भ एवं परिग्रह से रहित होते हुए ज्ञान, ध्यान और तप में लीन रहते हैं, उन्हें साधु परमेष्ठी कहा गया है| साधुगण साधना, तपस्या कर जीवन को त्याग एवं वैराग्य से जीते हुए परमेश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं| उनका मूल उद्देश्य समाज का पथप्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्त करना है। इसीलिए जैन दर्शन के महामन्त्र “णमो लोए सव्व साहुणं” में इस लोक के समस्त साधुवृन्दों का अभिनन्दन किया गया है| मैं उनको अपना मस्तक झुकाकर अभिनन्दन करता हूँ|
साधु एवं साधुत्व के मापदण्ड क्या है| ऐसे गंभीर एवं महत्वपूर्ण विषय पर उपाध्याय ऋषि प्रवीण जी ने अंग्रेजी भाषा में “Who is Saint” पुस्तक के माध्यम से “साधुत्व की परिभाषा” को सुन्दर ढंग से कलमबद्ध किया है|
उपाध्याय ऋषि प्रवीण जी द्वारा लिखित एवं Jainsindia Trust द्वारा प्रकाशित “Who is Saint” पुस्तक का अध्ययन करना चाहते है तो http://www.jainsindia.org/pdf/
who_is_a_saint.pdf लिंक पर यह पढ़ सकते हैं| डाक से यह पुस्तक मंगवाने हेतु इस लिंक में दिए पते पर संपर्क कर आप इसे प्राप्त कर सकते हैं| डाक से मंगवाने पर पुस्तक का मूल्य रूपये १००/- एवं डाक खर्च के साथ । Rs100/- including postage .
*जय जिनेन्द्र*
सुगालचंद जैन
चेन्नई – 600010
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