कोरोना को भगाने वाली जैन जीवन शैली

जैन जीवन शैली अपनाएं, कोरोना को भगाएं
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जैन धर्म त्याग प्रधान धर्म है। इसमें संयम, तप और साधना पर विशेष बल दिया गया है। यह केवल साधु-संतों के लिए नियम पालन की बात नहीं करता अपितु इसमें श्रावक-श्राविकाओं के लिए भी व्रतों का पालन करना उतना ही जरूरी है। अगर साधु-साध्वियों के लिए पांच महाव्रतों का पालन अनिवार्य है तो आम नागरिकों के लिए अणुव्रतों का विधान है। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य इन पांच महाव्रतों का पालन एक गृहस्थ व्यक्ति अणुव्रतों के रूप में कर सकता है। आज से शताब्दियों पूर्व भगवान महावीर ने आगार धर्म और अणगार धर्म का प्रतिपादन किया था। यही आगार धर्म गृहस्थ व्यक्तियों के लिए था।
तब से लेकर अब तक प्रत्येक जैन धर्मावलंबी इनका अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करके जीवदया को बढ़ावा देते हैं। 
आज जब सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है, चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है, तब हम कुछ साधारण बातों का ध्यान रखकर इससे बच सकते हैं। आइए जानते हैं क्या है वे सावधानियां, जिन्हें जैन धर्मावलंबी सदैव अपने व्यवहार में लाते हैं और समस्त प्राणियों को अभयदान देते हैं।
'जीओ और जीने दो' पर अमल करें
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मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। ईश्वर ने उसे अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक विवेकशील बनाया है। वह सोच सकता है, समझ सकता है और लाभ-हानि, सुख-दुख का अनुभव भी कर सकता है। उसके ऊपर सृष्टि के समस्त प्राणियों की रक्षा करने का दायित्व है, मगर विडम्बना यह है कि वह दिन-प्रतिदिन अपना यह दायित्व भूलता जा रहा है। वह अपने आपको सर्वेसर्वा मान बैठा है और सभी प्राणियों का हत्यारा बनता जा रहा है। इससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ रहा है और इसी वजह से आज हम एक अति सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव के भय से अपने-अपने घरों में कैद होने के लिए मजबूर हैं।
         आज कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले स्वार्थी लोगों की वजह से सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है। मानव जाति के लिए ऐसी विषम परिस्थिति उत्पन्न हो गई है कि वह घर में ही कैद रहे और बाहर निकले तो भी एक-दूसरे से सामाजिक दूरी बनाए रखें। आज इसी महामारी की वजह से लगभग दो महीनों से हम अपने-अपने घरों में कैद हैं। सामाजिक, आर्थिक और अन्य सभी गतिविधियां पूरी तरह से बंद है। स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 1 लाख 25 हजार 120 केस कोरोना संक्रमितों के सामने आ चुके हैं। उनमें से 69,597 का इलाज चल रहा है और 51783 ठीक हो चुके हैं, जबकि 3720 की मौत हो चुकी है। अगर दुनिया के बाकी देशों से तुलना की जाए तो हमारी स्थिति काफी संतोषजनक है। कुछ अराजक तत्वों को छोड़कर बाकी सभी लोग लाॅकडाउन का पूर्णतया पालन कर रहे हैं। अगर हम आगे भी संयमित जीवन जीने की आदत डाल लें और प्रकृति में जीव-जंतुओं के बीच जो संतुलन होना चाहिए, उसके साथ खिलवाड़ ना करें तो ऐसी महामारियों के प्रकोप से बच सकते हैं।
शाकाहारी बनें, स्वस्थ रहें
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जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। इसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की हिंसा का निषेध है। इसमें भक्ष्य और अभक्ष्य खाद्य पदार्थों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। मांस, मदिरा और अत्यधिक गरिष्ठ पदार्थों का सेवन इसमें त्याज्य बताया गया है। जैन धर्म के अनुसार हमें शुद्ध सात्विक आहार ही ग्रहण करना चाहिए और वह है- शाकाहार। इसके अनुसार सम्पूर्ण विश्व में 6 काय के जीव पाए जाते हैं-
1- पृथ्वीकाय 2- अपकाय 3- तेजसकाय 4- वायुकाय 5- वनस्पति काय और 6- त्रसकाय 
हमें जितना हो सके, इन सभी प्रकार के जीवों की हिंसा से बचना चाहिए और प्राकृतिक संसाधनों का उतना ही प्रयोग करना चाहिए, जितनी जरूरत हो। जैसे हमें अपनी जान प्रिय है और हम जीना चाहते हैं, उसी प्रकार अन्य जीव भी जीना चाहते हैं। हम केवल अपनी जिह्वा के स्वाद के लिए किसी जीव का वध न करें। हमारे पास इतनी तरह की सब्जियां, फल, अनाज और दालों के अलावा बहुत से खाद्य पदार्थ हैं, फिर हम इन प्राणियों की हत्या करके पाप के भागीदार क्यों बनें?
           जब हम किसी जीव की हत्या करते हैं तो उसके शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तन होते हैं और उनका सीधा असर उसके शरीर पर होता है और फिर उसे ग्रहण करने वाले पर। देखा तो यहां तक गया है कि लगातार मांसाहार करने वालों की प्रवृत्ति भी हिंसक हो जाती है और वे मनुष्य का वध करने में भी संकोच नहीं करते। साथ ही साथ मांसाहार से अनेक अन्य बीमारियां भी पैदा होती है, अतः स्वस्थ रहने के लिए शाकाहार ही उत्तम आहार है।
पानी उबालकर पिएं
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जैन धर्म की मान्यतानुसार पानी में असंख्य जीव होते हैं, अतः हमें पानी का सीमित इस्तेमाल करना चाहिए। पीने का पानी सदैव छानकर और उबालकर ही पीना चाहिए, जिससे हम उसमें छिपे अदृश्य जीवाणुओं की हिंसा के भागीदार न बनें। आज जब हम सब्जियों और फलों को गर्म पानी से धोकर और सेनिटाइज करके प्रयोग में ले रहे हैं, जैन धर्मावलंबी यह तरीका सदियों पहले से अपना रहे हैं। इसे सब्जियों को 'अचित्त' करना कहते हैं, जिससे उनमें किसी तरह का विकार ना रहे।
मास्क का प्रयोग करें
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हवा में भी जीवाणुओं का वास रहता है। जब हम खुले मुंह सांस लेते हैं और आपस में बातचीत करते हैं तो एक-दूसरे के सम्पर्क में आने से वातावरण में फैले अति सूक्ष्म जीवाणु हमारे शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। इसलिए इनसे बचने के लिए हमें मुंह पर मास्क लगाना चाहिए। जैन साधु-साध्वियां दीक्षा लेने के उपरांत जीवनपर्यंत 'मुखपत्ती' लगाकर रखते हैं, कभी खुले मुंह बात नहीं करते। श्रावक-श्राविकाएं भी उनसे बात करते वक्त मुंह पर रुमाल रखकर बात करते हैं। इससे न केवल हम हानिकारक जीवाणुओं के शरीर में प्रवेश से बचते हैं, अपितु हम उनकी हिंसा से भी बचते हैं। सामायिक, संवर और पौषध करते वक्त भी श्रावक-श्राविकाएं मुखपत्ती का प्रयोग करते हैं। साथ ही जमीन पर चलते समय 'पूंजणी' से पूंजते हुए चलते हैं अर्थात् आंखों से न दिखाई देने वाले जीवों की हिंसा का प्रत्याख्यान करते हैं।
      आज जब कोरोना महामारी की वजह से सम्पूर्ण विश्व में त्राहि-त्राहि मची हुई है, तब हम इन छोटी-छोटी बातों को प्रयोग में लाकर काफी हद तक अपने आप को इससे बचा सकते हैं। घर से बाहर निकलते समय अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हमें मास्क का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में जाते समय भी मास्क लगा होना चाहिए। अभी तो सरकार ने भी इसका प्रयोग अनिवार्य कर दिया है। हमें स्वयं को एवं अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए इन नियमों का पालन करना चाहिए।
सामाजिक दूरी बनाए रखें
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जबसे कोरोना वायरस ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया है, तब से ही उसके फैलाव को रोकने के लिए हम सब सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन कर रहे हैं। मगर कुछ लोग अभी भी स्थिति की गंभीरता को नहीं पहचान रहे हैं और एक जगह इकट्ठे होकर जश्न मना रहे हैं या सामूहिक रूप में धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। यह न केवल उनके लिए अपितु उनके परिवार और समाज सबके लिए घातक है। क्योंकि कोरोना से संक्रमित एक व्यक्ति जिन-जिन लोगों के सम्पर्क में आता है, उन सभी लोगों के संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाता है। जब तक हमें इसके बारे में पता चलता है, तब तक यह विकराल रूप धारण कर लेता है, जो हमारे लिए जानलेवा भी साबित हो सकता है।
           इसी सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन करने हेतु हम पिछले दो महीनों से घर में बैठे हैं और सम्पूर्ण लाॅकडाउन का पालन कर रहे हैं। अब जब आंशिक रूप से लाॅकडाउन खोला गया है तो यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम भीड़ इकट्ठी न करें। जैन धर्म में सामाजिक दूरी बनाए रखने का नियम पहले से ही मौजूद है। साधु-साध्वियों से बातचीत करते समय और ध्यान साधना करते समय भी एक निश्चित दूरी बनाकर रखना आवश्यक है। हम भी इस बात का ध्यान रखें कि अब किसी से मिलते समय न तो आपस में हाथ मिलाएं और न ही एक-दूसरे को गले लगाएं अपितु थोड़ी दूर से ही हाथ जोड़कर नमस्ते करें। जैन धर्मावलंबी जब भी आपस में मिलते हैं तो एक-दूसरे को अभिवादन करते समय 'जय जिनेन्द्र' बोलते हैं।
                कहने का तात्पर्य यह है कि हमें संयमित और सात्विक जीवन शैली अपनानी चाहिए। आधुनिकता की अंधी दौड़ में जिन चीजों को हम भूल गए थे, आज पुनः उन्हें अपनाने का वक्त आ गया है। कोरोना महामारी का प्रकोप इस बात का संकेत है कि हम अपनी जड़ों की ओर लौट चलें, अपनी प्राचीन संस्कृति को न भूलें। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखें। उसका अंधाधुंध दोहन न करें। समस्त प्राणियों को अपने समान समझें और उन्हें भी जीने का अधिकार दें। जब सब जीवों का अस्तित्व बना रहेगा, तभी हम सुख शांतिपूर्वक जीवनयापन कर सकेंगे अन्यथा फिर कोई कोरोना वायरस आकर हमें अपने घरों में कैद कर देगा।
- सरिता सुराणा(हैदराबाद)
वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार

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