सवालों के संदर्भ में हिंदुत्व

हिंदुत्व की मृत्यु...!


संकलन:प्रीति मजूमदार


प्रस्तुत विषय विरोधाभास से युक्त हैं क्योंकि विराट सर्वव्यापी सनातन एवं उसके अंदर सन्निहित महान हिंदुत्व, नाशादि भौतिक विकारों से रहित हैं। आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दो प्रकार के हिन्दू हो गए हैं :- जीवित एवं मृत। यहाँ जीवन या मृत्यु का अर्थ शरीर प्राप्ति या वियोग से नहीं है। तात्पर्य धार्मिक निष्ठा एवं तत्परता से है। 


*प्रत्येक हिन्दू के लिए आवश्यक है कि वह अपने वर्ण, जाति, आश्रम, कुल एवं पद के अनुरूप कर्तव्य का पालन करते हुए अधिकारों का उपभोग करे।*


इसके लिए आवश्यक है कि वह धैर्य, श्रद्धा, विनम्रता एवं परिश्रम से साथ मान्य शास्त्रीय परम्परा सम्मत मठ, आश्रम, गुरुमण्डल एवं आचार्यों की शरण ग्रहण करके मान्य प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर उनके ज्ञान से लाभान्वित हो। कर्तव्य एवं अधिकार के निर्वहन हेतु ज्ञान की आवश्यकता है और यही मार्ग ज्ञान प्राप्ति का सर्वाधिक प्रशस्त निमित्त है। यदि वह ऐसा करता है तो उसकी जीवित संज्ञा है।


परंतु मृत हिन्दू अपने भारतीय भाषा में रखे नाम के आगे पूर्वजों द्वारा प्राप्त पदनाम का प्रयोग मात्र करके स्वयं को हिन्दू मान लेता है। बाल्यकाल से ही अर्थप्रधान कुशिक्षा, स्वार्थपूर्ण नौकरी, कुभोजन, कुविचार, एवं कुसंगति से युक्त होकर यदि वह सप्ताह या महीने में एक बार किसी निश्चित दिन मांसाहार का परित्याग करके समीपवर्ती देवालय में पांच मिनट की उपस्थिति करा लेता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि देवगण एवं धर्मसभा कल्पांत पर्यंत उसके ऋणी हो गए हैं।


जीवित हिन्दू और मृत हिन्दू, दोनों ही मनुष्य देह से युक्त हैं फलतः मानवीय स्वभाववश दोनों के ही मन में अपार जिज्ञासाएं एवं प्रश्न होते हैं। दोनों के मन में अवतार, कर्म, आयाम, सृष्टि, समाज, सुख, दुःख, संयम, सिद्धि, संहार, विज्ञान, योग, भोग आदि से सम्बंधित अनंत समस्याएं होती हैं। जीवित हिन्दू को साधना एवं पाखण्ड के मध्य का भेद ज्ञात होता है, संत एवं व्यापारी के मध्य का भेद ज्ञात होता है, सिद्ध एवं जादूगर के मध्य का भेद ज्ञात होता है, क्योंकि वह सनातनी परंपरा से जुड़ा हुआ है। *अद्वैतवाद, द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, शांकर, वैष्णव, शाक्त, प्राजापत्य, गाणपत्य, कौल, अघोर, सौर, सांख्य, नैयायिक, वैशेषिक आदि अनेकानेक सर्वमान्य सर्वहितकारी उपासना एवं दर्शन पद्धतियों में से किसी न किसी से तो जुड़ा हुआ ही है।*


चाहे जिस शाखा पर बैठा हो, कम से कम मूलरूपी विशुद्ध ब्रह्म से भिन्न तो नहीं। अतः अपनी परम्परा के गुरुमण्डल की कृपा से उसकी जिज्ञासा का शीघ्र शमन होता है एवं वह निर्मल ज्ञान से युक्त होकर कल्याण को प्राप्त करता है। 


परंतु परम्परा विहीन, संस्कारविहीन, पशुवत् केवल उदरभरण एवं इन्द्रियसन्तुष्टि में लिप्त रहने वाला मृत हिन्दू जब किसी परिस्थिति, प्रेरणा या जिज्ञासावश सनातन सम्बन्धी गूढ़ रहस्यों को नहीं समझ पाता तो युगकालविक्षेप से भ्रमित होकर चकाचौंध एवं आडम्बर से भरे कथित प्रायोजित (अ)धर्मगुरुओं, पाखण्डियों, एवं शास्त्र के अर्थ का अनर्थ करने वाले स्वघोषित ऋषियों एवं भाष्यकारों की शरण ग्रहण करके उनके द्वारा मायामय अर्थवाद से ग्रस्त होकर सत्य से कोशों दूर चला जाता है। 


हम जिस युग की ओर बढ़ रहे हैं, उसका अंत पूर्व में भी किया जा चुका है। हम जिन आविष्कारों से चमत्कृत हैं, उनका उपभोग पूर्व में भी किया जा चुका हैं। हम जिन प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं से घिरे हैं, उनका समाधान पूर्व में भी किया जा चुका है। हमारे महान पूर्वजों के मन में ये सब प्रश्न आ चुके हैं जिसका समाधान घोर अनुसन्धान, मनन एवं साधना के माध्यम से करके उसे ग्रंथों में सूत्रात्मक रूप से संग्रहित कर दिया गया है। परंतु ज्यादा विचारवान दिखने की होड़ में मनुष्य खुद का ही सर्वनाश करता है। 


बिना उचित तकनीक के मलेरिया के क्षुद्रतम विषाणु को चर्मचक्षु से देखने की क्षमता है नहीं, कुत्ता 25000 हर्ज्ड तक की ध्वनि सुनता है, हाथी एवं डॉल्फिन 6 हर्ज्ड तक सुनते हैं। मनुष्य केवल 20 से 20000 तक। बिना तकनीक के बाकियों को न देख सकते हो, न सुन सकते हो। लेकिन ईश्वर को चाहते हो कि आधार कार्ड लेकर सामने खड़ा रहे। ईश्वर को जानने की जो तकनीक शास्त्र ने, ऋषियों ने बताई है, वो अनुसरण करो, जान जाओगे। जैसे खुद तो खून जांच नहीं करते, जो विधि जानता है, उससे करा कर विश्वास करते हो। उसी प्रकार ऋषियों के ग्रंथों पर भी विश्वास होना चाहिए। मृत हिन्दू जिज्ञासा तो करता है परन्तु उसके शमन के लिए उचित विधि का आश्रय नहीं लेता।


आजकल मृत हिन्दू ऐसे प्रश्न पूछ रहे हैं जैसे गूगल में खोजा, तैयार उत्तर मिल गया, और इतिश्री। ये विषय ऐसा नहीं है। आप दनादन पूछते रहते हैं। मानव मन की जिज्ञासा है, और उचित जिज्ञासा है। अब वस्तुनिष्ठ प्रश्न के उत्तर तो तुरंत दिए जा सकते हैं, लेकिन सैद्धांतिक प्रश्नों के उत्तर सामने बैठ का चर्चा करते हुए, सोदाहरण समझाए जाते हैं। आप दिन भर इधर उधर व्यस्त रहेंगे, कभी स्वयं से ग्रंथों का अवलोकन नहीं करेंगे, फिर शाम को एक बार एक घण्टे दस बीस प्रश्न पूछ कर ज्ञानप्राप्ति का प्रयास करेंगे तो यह मार्ग न सही है और न कारगर। जिन बातों को कई ग्रंथ पढ़कर, गुरुमुख से ध्यान पूर्वक सुनकर, मनन कर समझना होता है, वो इतने ही आसानी से एक पंक्ति में लिखकर दे दिए जा सकते थे तो ऋषिगणों ने इतना क्लेश क्यों सहन किया ? हद तो तब होती है कि कल्पित गुरुओं के अन्धशिष्यों के प्रति, कोई शास्त्र में कही बातों को बस हिंदी अनुवाद के साथ उनके सामने रखता जाए, और उन बातों से उनके मत का खंडन होता हो तो धमकी देने लगेंगे। स्वयं ही शास्त्र को गलत बताने लगेंगे और अपने को, एवं अपने गुरुओं को निर्विवाद ब्रह्मवेत्ता ...


इसीलिए कहता हूँ, पहले ग्रंथ पढिये। आपके मन में जो सवाल आते हैं, वो पहले भी मानव के मन मे आते रहे हैं। और उनका समाधान भी ऋषियों ने करके ग्रंथ में डाल दिया है। आप कोई नए नहीं हैं। ये सब बहुत गंभीर विषय हैं, ऐसे उत्तर नहीं मिलता। पहले ग्रंथ पढ़ें। फिर समझ में न आये तो पूछें। हां, यदि यह ज्ञात नहीं कि कौन से प्रश्न का उत्तर कहाँ मिलेगा, तो मैं अवश्य सहायता करके उचित ग्रंथ या गुरु का सन्दर्भ दूंगा। 


पढ़ने के बाद कोई विषय समझ न आये या प्रति शंका उत्पन्न हो जाये तो भी मैं समाधान बताऊंगा। परंतु यदि आप यह चाहते हैं कि दिन भर भोजन, वाणी, परिवेश एवं विचारों के धार्मिक निर्देशों की धज्जी उड़ाकर सन्ध्या को मुझसे गूढ़ विषयों पर प्रश्न करें, तो यह ध्यान रहे कि ज्ञान पात्र को दिया जाता है, एवं यह पात्रता नहीं है। अतः आज से मैं केवल आपको ये बताऊंगा कि कौन सा विषय कहाँ मिलेगा। यदि आप वास्तव में जिज्ञासु हैं, और ज्ञान के अधिकारी हैं, तो स्वयं परिश्रम करके ज्ञान अर्जन करें। मैं उसके बाद ही सहायता करूँगा। मेरे मत में समस्त व्यासपीठ, धर्मपीठ एवं समानांतर धर्माधिकारी समुदाय को यह बात समाज में व्यावहारिक धरातल पर समझानी चाहिए कि ग्रंथ एवं गुरु के समायोजन से ही गोविंद का रहस्य समझ आ सकता है अन्यथा हिन्दू समाज का यह संक्रमण उपेक्षा मृत्युदायी रोग बड़ी विकट स्थिति का बीजारोपण करेगा।  नमो नारायणाय...

असतो मा सद्गमय....
तमसो मा ज्योतिर्गमय....
मृत्योर्मा अमृतं गमय....

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru

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