पहले निर्भया अब प्रियंका!

दिल्ली निर्भया कांड के वक़्त चंद पंक्तियाँ लिखी ,आज हैदराबाद कांड पश्चात याद आ गई वो आप से साझा कर रहा हूँ:-


अस्मत खोई थी

------- छत्र छाजेड़“फक्कड़”


धरती सोयी थी
रात रोयी थी
आज फिर
एक अबला ने अस्मत खोयी थी

इनका क्या
ये तो हैं ख़ूँख़ार भेड़िये
क्या लेना देना
इनका मन-भावों से
सुन कर चीख़ें
बेबस लाचार यौवन की
तड़पा पलंग,किलसी चद्दर
प्याले से छलकती मय भी रोयी थी
आज फिर
एक अबला ने अस्मत खोयी थी

उतरी हलक से
जब अंगूर की बेटी
गोश्त,गोश्त में भेद कहाँ
नोच नोच देह
कर दी बोटी बोटी
रहा ख़ामोश मगर सारा जहां
रहा देखता खुली आँखों ले
बंद खिड़की के पीछे
मूक दीवारें बस रोयी थी
आज फिर
एक अबला ने अस्मत खोयी थी

ग़ुरूर कितना
मदहोशी में
क्या अच्छा,क्या बुरा
बढ़े सुरूर में
धवल वस्त्रों में छिपी
इज़्ज़त सारा दिन
सिसकती रही
रात के स्याह अंधेरों में
दो पल के आनंद हेतु
मचा दिया कोहराम
कर दिया जीना हराम
हो गये हालात अजब कि
छुप छुप कर ग़ैरत रोयी थी
आज फिर
एक अबला नें अस्मत खोयी थी

चाँद हँसा था
सूरज छिपा था
झिलमिल करती
तारों की आँखें रोयी थी
एक बार सुना
थू थू करी और भूल गये
गृहस्थी के हिसाब में झूल गये
इतिहास बन जायेगी वारदात
बन रह जायेगा एक क़िस्सा
प्राची की लाली संग देखो
नभ में नई सुबह फिर होयी थी
आज फिर
एक अबला ने अस्मत खोयी थी
धरती सोयी थी
रात रोयी थी
फिर अस्मत खोयी थी


टिप्पणियाँ