सगाई इससे - शादी उससे.....
यहां रिश्ते कब बनते और टूटते है पता कब चलता है! लगता है यहां भावनात्मक कुछ भी नहीं होता जो होता है वो तात्कालिक लाभ के आधार पर सौदा होता है।
यही भारतीय राजनीति का चाल चरित्र है और यही दर्शन है।यहां कुर्सी बड़ी होती है आदर्श छोटे होते है....कुर्सी के लिए खून के रिश्ते तोड़ दिए जाते है और मन के रिश्ते भी छोड़ दिए जाते है।
महाराष्ट्र के घटनाक्रम इस चरित्र की फिर याद दिला रहे है और यह बता रहे है कि वक़्त चाहे और कितना ही क्यों न बदल जाए पर भारतीय राजनीति नहीं बदलने वाली....आप इसे कोठे वाली कहिए या परकोटे वाली पर यह कहना भी इनका अपमान करना होगा....
मुजरे वाली भी अपने आदर्श रखती है जो राजनीति में कहा होता है!भारतीय राजनीति तो सार्वजनिक स्थानों पर भी जैसे कपड़े उतारने में कोई संकोच न करे उतनी बेशर्म है....
बिल्कुल लम्हों में बिस्तर बदलने वाली रण्डी है.......पहली बार इस शब्द का प्रयोग मैंने अपने लेखन में किया है पर क्या कीजिए जब कोई है ही ऐसा तो उसको उसका असली नाम देने से आप कब तक बचते रहिएगा......
अब जिनकी गरिमा नहीं उनके लिए गरिमामय शब्द कब तक रखियेगा।होंगे कुछ अपवाद..... पर अब तो लगता है जैसे कुर्सी के लिए कोई बाहर से तो कोई अंदर से कोई सरे आम तो कोई चुपके से बिकने के लिए तेयार ही बैठे है।
अगर समय हो सच्चाई सुनने का तो फिर इस लिंक पर क्लिक करके वीडियो सुनिए और फिर बात आपको आपके मन की न लगे तो फिर कमेंट बॉक्स पर आकर जो चाहे वो कहे।
मेरे साथ बिंदास और बेबाक अंदाज में बोलने वाले संजय बोहरा को सुनिए।
संजय सनम7278027381
टिप्पणियाँ