भाषा की शालीनता जरूरी है।

वैचारिक विरोध में तार्किक पक्ष  शालीनता से रखा जाए तो वो विरोध फिर समालोचना बन जाता है और आम जन भी उसका समर्थन करते हुए उन तर्को के साथ खड़े हो जाते है।पर उस विरोध में अगर अशालीन शब्दावली का प्रयोग भावुकता,आक्रोश या अज्ञानता से हो जाये तब आपका वो विरोध अपना लय ही खो देता है और खुद सवालों के कटघरे में खड़ा हो जाता है इसलिए किसी की आलोचना करने से पहले भाषा के संयम की आवश्यकता सबसे अधिक होती है।विसंगतियों पर आवाज़ उठनी चाहिए पर उस आवाज की भी अपनी गरिमा होनी चाहिए।

https://youtu.be/aVVLHJ5Q30s

एक औऱ विषय जो बहुत गंभीर इन दिनों हो गया है वो है--
आपसी बातचीत के वायरल होते वीडियो जो एक दूजे के विरोध में हथियार स्वरूप प्रयोग में लाये जा रहे है इससे विश्वास शब्द का अस्तित्व ही खतरे में आ गया है--आखिर कहां तक आ गए है हम! अब यह सवाल हम सब पर सवालिया निशान बन कर खड़ा है।
इस वीडियो में कुछ ऐसे ही संदर्भ रखे गए है -संदर्भ कड़वे है तो स्वाद मीठा नहीं होगा पर समझने से यह मीठा भी लगने लग सकता है।इस वीडियो को पूरा सुनियेगा औऱ अपनी सहमति असहमति को कमेंट बॉक्स पर दर्ज करना न भूलिएगा।आप अपने विचार- सुझाव गर देना चाहे तो उसका ह्रदय से स्वागत है।
संजय सनम

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