बंगाल की सियासत में आये जय श्री राम


बंगाल की सियासत में जय श्री राम


जय श्री राम हिन्दू संस्कृति का नारा है पर बंगाल में इन लोकसभा चुनावों के आखिरी मोड़ पर आते आते यह राजनीतिक उद्घोष बन गया जिसकी वजह से बंगाल की दो मुख्य पार्टियों में तकरार और जंग जारी है और यह जंग सिर्फ शब्दों तक ही सीमित नही रही बल्कि इसने हिंसक रूप धारण भी कई स्थानों पर कर लिया था।
जय श्री राम जो मर्यादा पुरुषोत्तम का नाम है उस नाम का जयकारा तो मर्यादा व प्रेम ,सद्भाव का प्रतीक होता है पर सियासत की सड़क जब वोटों की गणित पर चलती है तब वो राम को भी छलती है।



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बंगाल की राजनीति में यह नारा अनायास ही आया या फिर रणनीति से आया कहना मुश्किल है पर अब यह भाजपा का ब्रह्मस्त्र सा बन गया लगता है।जय श्री राम के नारे का प्रयोग जब जब ममता दीदी के सामने हुआ और उन्होंने जिस रूप में अपनी प्रतिक्रिया दी है तब- तब यह नारा राजनीतिक उकसावे का रूप भी बन गया और अब तो बंगाल भाजपा के प्रभारी श्री कैलाश विजय वर्गीय ने इस नारे के पहले माँ काली का जयकारा भी राजनीतिक चतुरता से जोड़ कर बंगाल की सियासत में दीदी के सामने एक और चुनोती दे दी है।
बंगाल की संस्कृति में माँ काली के प्रति श्रद्धा,आस्था की जो महक रची है उसका नाम सबसे पहले लेकर भाजपा ने ममता को अप्रत्यक्ष रूप से चुनोती ही दे दी है कि इस नारे पर भी विरोध करने की हिम्मत कर के दिखाए क्योकि बंगाली समुदाय की भावनाएं अपनी आस्था मां काली से जुड़ी है और ममता दीदी ने जैसी प्रतिक्रिया जय श्री राम के नारे पर दी थी वो जबाब जय माँ काली पर नही दे पाएगी।


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भाजपा ने जय श्री राम से पहले जय माँ काली का जयकारा जोड़ कर ममता दीदी को बैकफुट पर खेलने को मजबूर कर दिया है या ममता दीदी उसका कोई माकूल जबाब दे देती है यह वक्त बताएगा पर यह तय है कि बंगाल की सियासत में पहले राम आये थे अब माँ काली भी जब आ गई है तब यह उम्मीद कर सकते है कि बंगाल में अब जो भी होने जा रहा है वो काली व राम के रहने से अच्छा ही होगा और इस बहाने वातावरण में राम और काली के जो नाम उच्चारित होंगे उससे भी माहौल का शुद्धिकरण होगा।

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