सिर्फ एक नजर भर मिलती
और अपने से लगने लगते है
चुरा चुरा कर नजरों को
जो नजरों से कहने लगते है
अनजान दो दिल जब
बेकरार से दिखने लगते है
जमाने की भीड़ से
जो अलग से चलने लगते है
ना जान--ना पहचान
पर एक दूजे में रहने लगते है
भीड़ के शोर में
खामोशी से भी कुछ कहने लगते है
विदा लेने से पहले
मुड़ मुड़ कर देखने लगते है
चूंकि उस दिन उनकी बात नही होती
नजरें मिलती-बैचनी बढ़ती
पर आमने सामने शब्दों की मुलाकात नही होती
तब अगले दिन
फिर वो ही गली-- और वक्त भी वो ही होता है
जब दो दिलों का सफर
एक दूजे को कुछ कहने चला होता है
एक आता--दूसरा गर नहीं दिखता
तो नजर दूर तक
गली के उस छोर पर टिकी रहती है
वो जब तक नही दिखता/ दिखती
तब तक नजर वही खड़ी रहती है
और जैसे ही वो दिख जाता
दिल की कली खिल जाती है
कली को भंवरा मिल जाता
चमन को बहार मिल जाती है
प्रेम की भाषा भी तब
ठहर जाती है
जब प्रेमी से प्रेमिका
यू मिल जाती हैं
कुछ देर नजरे मिलती
फिर शायद भरती भी है
जुबा खुलने से पहले
घबराहट में अटकती भी है
खामोशी टूटने से पहले
कुछ कुछ होता भी है
भावनाओं के समंदर में
तूफान उमड़ता भी है
हाथ बढ़ते- हाथ मिलते
अब ये भीड़ से कही अलग सरकते
अब जान पहचान होती है
पर मोहब्बत तो तब होती
जब दिलों की गली अनजान होती है
जो तार दिलों के नजरों से जोड़ जाते है
ये प्रेमी- प्रेमिका के रिश्तें
प्रेम की जुबान
धड़कनों से बोल जाते है
प्रेम किताब के पन्ने
जो चुपचाप खोल जाते है।
- संजय सनम
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